Bihar

“युवा बिहारी” चिराग पासवान – बिहार के सम्मान का जोरदार ऐलान, बिहार चुनाव पर होगा असर ।

दिलचस्प है कि लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने अपने नाम के आगे “युवा बिहारी” जोड़ दिया है। अपने twitter हैन्डल पर अपना नाम “युवा बिहारी” चिराग पासवान रख लिया है।

बिहार में चुनाव सर पर हैं और पार्टियां और नेता अपनी जमीन तलाश रहें हैं। कोरोना का कहर भी है। ऐसे में जब कोरोना का कहर कम होने का नाम नहीं ले रहा है और चुनाव आयोग चुनाव समय पर करने पर संकल्पित है तो यह साफ जाहिर हैं की इस बार बिहार चुनाव भावनाओं पर और सोशल मीडिया पर लड़ जाएगा। इस बार जमीनी रैलियाँ बहुत कम होंगी और सोशल मीडिया पर चुनाव का जोर होगा।

लालू प्रसाद यादव ने बिहार में हमेशा से सम्मान के नाम पर चुनाव लड़ा और 15 साल तक राज किया। लालू यादव की पूरी राजनीति बिहार और बिहारी के सम्मान पर केंद्रित थी। लालू प्रसाद यादव का मुंबई में छठ पूजा करना पूरे देश में बड़ी खबर बनी थी। चिराग पासवान “युवा बिहारी” शब्द के सहारे अपने आप को बिहार के यूथ का नेता स्थापित करना चाहतें हैं।

बिहार का यह चुनाव भविष्य के नेता का चुनाव है। यूथ लीडर चिराग पासवान होंगे या फिर tejashviyadav तेजस्वी यादव होंगे। असली लड़ाई अगली पीढ़ी का नेता बनने की है। देखना दिलचस्प होगा कि tejashviyadav तेजस्वी यादव कब अपने नाम के साथ “युवा बिहारी” जोड़ते हैं।

बिहार की राजनीति के दो बड़े खिलाडि़यों के उत्तराधिकारी अपने पिता की विरासत को विस्तार देने की मुहिम में हैं। विधानसभा चुनाव दोनों के लिए निर्णायक साबित होने वाला है। कामयाब हुए तो खुला आसमान मिलेगा। चूक गए तो पिता की उम्मीदों को झटका लगना तय है। राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के भविष्य तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के पिता लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) प्रमुख चिराग पासवान (Chirag Paswan) के पिता रामविलास पासवान(Ram Vilas Paswan) को जेपी आंदोलन की उपज माना जाता है। दोनों एक साथ पनपे और फैले। उनके पुत्रों के भी पलने और फैलने का समय भी एक ही है। क्यारियां अलग-अलग हैं, किंतु मिट्टी, मौसम और मुहूर्त में कोई फर्क नहीं है।

पिता की पाठशाला से निकल सीधे कर्मशाला कर गए प्रस्थान

राजनीति में आने और छाने के लिए न तो तेजस्वी यादव को संघर्ष करना पड़ा और न ही चिराग पासवान को। पिता की पाठशाला से निकलकर सीधे कर्मशाला की ओर प्रस्थान कर गए। चिराग पासवान पहली बार 2014 में सांसद बने और तेजस्वी यादव 2015 में विधायक व उपमुख्यमंत्री बने। दोनों लगभग हमउम्र हैं और अविवाहित भी। राजनीति से पहले दोनों ही ग्लैमर की दुनिया में थे। तेजस्वी यादव को क्रिकेट प्यारा था तो चिराग पासवान फिल्मों में किस्मत आजमा रहे थे। अब दोनों की राजनीति कशमकश से गुजर रही है। वजूद आमने-सामने है।

लालू की जमीन पर तेजस्वी के पैर, चिराग के पीछे पासवान

तेजस्वी यादव आरजेडी के 80 विधायकों को नेतृत्व कर रहे हैं तो चिराग छह सांसदों वाली पार्टी की बागडोर संभाल रहे हैं। तेजस्वी के पैर लालू की जमीन पर हैं तो चिराग पासवान के लिए भी पासवान ने सारी कायनात को अनुकूल कर रखा है। आगे का सफर दोनों को खुद तय करना है।

फिलहाल चिराग से ज्‍यादा दिख रहा तेजस्वी का प्रभाव

फिलहाल तेजस्वी यादव का प्रभाव कुछ ज्यादा दिख रहा है। लालू ने उन्हें महागठबंधन के अघोषित नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। चिराग पासवान इस मोर्चे पर अभी संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। हालांकि, सधी हुई चाल का संकेत है कि चिराग पासवान भी नई पीढ़ी की राजनीति में अपने लिए जगह बनाने की राह पर हैं। पारिवारिक मोर्चे पर उन्हें समर्थन भी मिल रहा है। जबकि, तेजस्वी यादव को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

दोनों ने ही की पिता की पुरानी लीक को ठीक करने की कोशिश

राजनीति का रास्ता भले ही पिता ने दिखाया, किंतु दोनों ने ही पिता की लीक को ठीक करने की जरूरत समझी है। लालू-राबड़ी के कार्यकाल की गलतियों के लिए तेजस्वी यादव ने खुले मंच से माफी मांगकर उन्हें भी जोडऩे की कोशिश की है, जो राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के राज में प्रताडि़त-प्रभावित थे। चिराग पासवान ने भी राजनीति में प्रवेश के पहले ही पासवान की सियासी बिसात को अपने हिसाब से सजाया। गोधरा कांड के बाद केंद्र की अटल बिहारी सरकार से इस्तीफा देकर बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने के पक्षधर पिता को खींचकर फिर से बीजेपी के कुनबे में खड़ा किया। चिराग ने अपने पिता को राजनीति के 14 फीसद बनाम 86 फीसद के फॉर्मूले को समझाया और दिल परिवर्तन के लिए तैयार किया।

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