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हमारे देश के हर प्रधानमंत्री इतना रोते क्यों हैं?

प्रधानमंत्री

हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की सत्ता संभाले हुए लगभग 7 साल होने वाले है, लेकिन इस दौरान ये इतनी बार रोये है, कि इनकी आंसुओं को जमा कर के, हम एक आंसुओं का म्यूजियम खोल सकते हैं, ताकि आने वाली नई नस्लें प्रधानमंत्री के अलग-अलग समय पर निकले आंसुओं को देख सकें। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री में एक बात भी है, पता ही नहीं चलता कब आंसू निकलेगा और कब सूख जाएगा। एक बार तो हमारे क्रिकेटर के उंगली में मामूली सी चोट आ गई थी, तो इनके आँखे ट्वीटर पर छलक गई।

अब देख लीजिए देश के किसान सारी सर्द रातें सड़कों पर काट ली, इस दौरान आसमान से भी खूब बारिशें हुई लेकिन इस बार पीएम मोदी के आंसू सूख गए।

आंसुओं की कहानी

इस देश में सहृदय प्रधानमंत्रियों के भावुक होकर आंखें छलकाने का इतिहास पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से ही चला आता है। 1962 के युद्ध में चीन के हाथों मिली शिकस्त के बाद 1963 के गणतंत्र दिवस समारोह में राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा ‘ऐ मेरे वतन के लोगो! जरा आंख में भर लो पानी’ वाला भावप्रवण गीत गाया तो उसे सुनकर नेहरू की आंखें डबडबा आई थीं।

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इससे बहुत पहले 30 जनवरी, 1948 को भी, महात्मा गांधी के निधन के बाद, कहते हैं कि उनके पार्थिव शरीर के पास ही गीतकार राजेंद्र कृष्ण का लिखा और मोहम्मद रफी का गाया ‘सुनो-सुनो ऐ दुनिया वालो, बापू की यह अमर कहानी’ गीत सुनकर भी वे खुद पर काबू नहीं रख पाए थे और फूट-फूटकर रोने लगे थे. बाद में मोहम्मद रफी को अपने घर बुलाकर उन्होंने उनसे दोबारा यह गीत सुना और अगले स्वतंत्रता दिवस पर रजत पदक प्रदान किया था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्रीकाल लंबा नहीं रहा. वे इस काल की पहली वर्षगांठ भी नहीं मना पाए थे। लेकिन इस दौरान अपने गृहराज्य उत्तर प्रदेश में एक दलित महिला से हुए अत्याचार के बाद उसे ढाढ़स बंधाने पहुंचे तो वे भी अपनी आंखें नम कर ही बैठे थे। प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, कांग्रेस के दिवंगत नेता माखनलाल फोतेदार की आत्मकथा की गवाही मानें तो छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा से मिलने गए, तो डॉ. शर्मा भी बच्चों की तरह रो पड़े और विह्वल होकर उनसे पूछने लगे थे, ‘पीवी (तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहसिम्हा राव) ने यह क्या करा डाला?’

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दरअसल, वे इस ध्वंस से पांच महीने पहले ही देश के प्रथम नागरिक बने थे और उनसे उक्त ध्वंस सहा नहीं जा रहा था। हां, प्रधानमंत्रियों के इस तरह आंखें छलकाने की जहां यह कहकर प्रशंसा की जाती रही है कि इससे कम से कम इतना तो साबित होता ही है कि राजनीति के पाप पंक में रहकर भी वे सर्वथा निष्ठुर या हृदयहीन नहीं हुए हैं, वहीं आलोचनाएं भी कुछ कम नहीं की गई हैं। 1963 में लता का गीत सुनकर नेहरू की आंखें डबडबाने की खबर आई तो समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने तमककर उन पर निशाना साधते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री का काम रोना-बिसूरना नहीं, देश का नेतृत्व करना और उसका हौसला बढ़ाना होता है।

1963 में लता का गीत सुनकर नेहरू की आंखें डबडबाने की खबर आई तो समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने तमककर उन पर निशाना साधते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री का काम रोना-बिसूरना नहीं, देश का नेतृत्व करना और उसका हौसला बढ़ाना होता है।

लेकिन जैसे संकीर्ण राजनीतिक निहितार्थ बीते हफ्ते कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की राज्यसभा से विदाई के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रो पड़ने को लेकर निकाले जा रहे हैं, न सिर्फ उनके विरोधियों बल्कि समर्थक मीडिया द्वारा भी, वैसे किसी प्रधानमंत्री के आंसुओं को लेकर कभी नहीं निकाले गए।

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शायद इसलिए कि तब प्रधानमंत्री या कि राष्ट्रपतियों के आंसू इतने नकली, स्वार्थी या घड़ियाली नहीं हुआ करते थे.प्रधानमंत्री और उनकी जमातों के समर्थक माने जाने वाले एक हिंदी दैनिक ने लिखा है कि उनकी भावुकता का उक्त क्षण राजनीतिक तस्वीर भी बदल सकता है क्योंकि उन्होंने गुलाम नबी को अपना ‘सच्चा मित्र’ बताते हुए कहा है कि वे उन्हें निवृत्त नहीं होने देंगे। कांग्रेस में गुलाम नबी को ‘तिरस्कृत कर हाशिये पर डाल दिए जाने’ का जिक्र करते हुए इस दैनिक ने संकेत दिया है कि प्रधानमंत्री उन्हें अपने पाले में लाकर कश्मीर के हालात सुधारने में अपना मददगार बनाने वाले हैं।

कई जानकार उनके आंसुओं को लेकर दूसरी तरह की बातें भी कहते हैं। मसलन, उन्हें देश की सत्ता संभाले साढ़े छह साल हो चुके हैं और इस दौरान वे लगभग इतनी ही बार रो भी चुके हैं। 2014 में वे संसद के सेंट्रल ह़ॉल में लालकृष्ण आडवाणी पर बोलते-बोलते रो पड़े थे, तो उसके अगले ही साल फेसबुक के दफ्तर में अपनी मां को याद कर।

2016 में नोटबंदी के बाद भी वे रोए ही थे। फिर 2020 में बहुप्रचारित जनधन योजना की एक लाभार्थी से बात करते हुए भी, जिसने उनकी तुलना भगवान से कर डाली थी। कहीं डॉ. लोहिया आज होते तो उनसे पूछे बिना रह नहीं पाते कि आप कैसे प्रधानमंत्री हैं, जो जरा-जरा सी बात पर इस तरह रो पड़ते हैं? फिर आपकी यह रुलाई उस वक्त क्यों नहीं फूटती, जब गरीब, लाचार व कमजोर लोगों पर आपकी सत्ता के निष्ठुर फैसलों की मार पड़ती है? कई दफा सोचता हूँ, प्रधानमंत्री इतना रो कैसे लेते है, और इतना कुछ आँखों से देखने के बाद चुप कैसे हो लेते हैं।

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