Delhi

किसान आंदोलन और अन्ना आंदोलन में क्या है अंतर , क्या इससे यूपीए को लाभ मिलेगा

किसान आंदोलन

केंद्र सरकार के खिलाफ हाल के कई विरोध प्रदर्शनों के उलट किसान आंदोलन ने कहीं बड़ी अनुगूंज पैदा की है। यही नहीं, वक्त के साथ इसका दायरा भी फैलता जा रहा है। इसे समाज के दूसरे वर्गों का समर्थन भी मिलने लगा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह आंदोलन मोदी सरकार के लिए वैसा ही साबित हो सकता है जैसा करीब एक दशक पहले भ्रष्टाचार के विरोध में उभरा अन्ना आंदोलन यूपीए सरकार के लिए हुआ था। माना जाता है कि अन्ना आंदोलन ने ही 2014 के आम चुनाव में भाजपा की विजय का रास्ता साफ किया था।

यह सवाल इसलिए भी पूछा जा सकता है कि गौर से देखने पर दोनों आंदोलनों की कई बातें मिलती-जुलती लगती हैं। अन्ना आंदोलन यूपीए सरकार के दुबारा सत्ता में आने के करीब डेढ़ साल बाद शुरू हुआ था। वह सरकार 2009 के आम चुनाव में 2004 के मुकाबले और मजबूत होकर सत्ता में आई थी। किसान आंदोलन भी 2019 के आम चुनाव में मोदी सरकार की पिछले चुनाव से भी बड़ी जीत के लगभग डेढ़ साल बाद ही उभरा है। अन्ना आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी। कमोबेश ऐसा ही किसान आंदोलन के साथ भी है।

पहला कारण आंदोलन को मिलने वाला समर्थन है। अन्ना आंदोलन से जुड़े लोग देश के हर हिस्से से थे जबकि किसान आंदोलन से देश के कई राज्यों के किसान पूरी तरह दूर हैं। हिंदी भाषी क्षेत्र के कुछ राज्यों को छोड़कर देश के बाकी हिस्सों में किसान आंदोलन का कोई असर नहीं है।

दूसरा कारण आंदोलन के नेतृत्व का अक्खड़ रवैया है। सरकार की मानें तो उसने किसानों को कृषि कानून में बदलाव से संबंधित कई प्रस्ताव दे चुकी है, लेकिन किसान नेता कानून को रद्द करने के अलावा और किसी मुद्दे पर बात ही नहीं करना चाहते। ऐसे में किसान आंदोलन का स्वरूप सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ होता जा रहा है जो किसी भी शर्त पर एनडीए को सत्ता से बाहर करने को तैयार है।

तीसरा बड़ा कारण अन्ना आंदोलन का बेदाग अहिंसक चरित्र है। अन्ना हजारे और उनके साथ अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए भूख हड़ताल और आमरण अनशन जैसे तरीके अपनाए। उनके समर्थकों ने कभी सड़कों पर इस तरह कोहराम नहीं मचाया, जैसा मंगलवार को दिल्ली में किसानों ने किया।

वरिष्ठ पत्रकार क्या मानते हैं

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई मानते हैं कि इसकी वजह वे फर्क हैं जो दोनों आंदोलनों को अलग-अलग करते हैं। अपने एक लेख में वे कहते हैं, ‘अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि मध्य वर्ग इस आंदोलन का समर्थन कर रहा है भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन से मध्य वर्ग खुद को तुरंत ही जुड़ा महसूस करने लगा था।’ यह जुड़ाव यूपीए सरकार के उन घोटालों की वजह से संभव हुआ था जो उन दिनों एक के बाद एक करके सामने आ रहे थे। लेकिन इस आंदोलन से वह कड़ी गायब है।

राजदीप सरदेसाई सहित कई मानते हैं कि भ्रष्टाचार के विरोध में उठा अन्ना आंदोलन इसलिए ही इतना बड़ा हो सका कि उसे सबसे ज्यादा समर्थन उस मध्य वर्ग से मिला जिसकी ताकत बाजार की शक्तियों के चलते आज के भारत में सबसे ज्यादा है। इस वर्ग के लिए भ्रष्टाचार एक भावनात्मक मुद्दा है। जानकारों के मुताबिक यही वजह थी कि देखते ही देखते भारत के तमाम शहर जंतर-मंतर बन गए क्योंकि इस वर्ग की ज्यादातर आबादी इन शहरों में ही रहती है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन अपने एक लेख में कहते हैं, ‘किसानों की लड़ाई कहीं ज़्यादा तीखी है. बेशक, उन्हें उन तमाम वर्गों का समर्थन मिल रहा है जो कई अलग-अलग वजहों से पहले से ही मोदी सरकार से नाराज और निराश हैं, लेकिन मोदी पर भरोसा करने वाला जो प्रचंड बहुसंख्यक समर्थन है, वह अब भी सरकार के साथ बना हुआ है?’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘यानी इस आंदोलन के सामने एक संकट अपनी बात उस ताकतवर भारत तक पहुंचाने का भी है जो कुछ सुनने को तैयार नहीं है।’ अन्ना आंदोलन के सामने यह मुश्किल नहीं थी।

वैसे जिस तरह यह आंदोलन आगे बढ़ रहा है उसमें इसकी सफलता की संभावनाएं देखते हुए प्रियदर्शन लिखते हैं, ‘अगर यह आंदोलन लंबा चला तो यह तीन कानून वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को अनिवार्य बनाने की मांग भर नहीं रह जाएगा, यह निर्णयों और नीतियों के निर्धारण में भागीदारी का आंदोलन भी बन जाएगा, यह लगभग स्वेच्छाचार की ओर बढ़ती सरकार को याद दिलाने का आंदोलन भी बन जाएगा कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों में हासिल की जाने वाली रणनीतिक सफलता का नाम नहीं है, उसकी कसौटियां और भी होती हैं।’

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