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‘गोलवलकर’ और कश्मीर के राजा ‘हरि सिंह’ की वह बातें, जो आज भी प्रासंगिक हैं

कहा जाता हैं कि अगर बीजेपी पेड़ है तो आरएसएस उसके क्लोरोफिल हैं। सीधे तौर पर कहें तो आरएसएस का रूह बीजेपी में निवास करती हैं। बीजेपी के सभी बड़े नेता यहीं से मार्गदर्शन लेकर देश की राजनीति में अपनी महत्वूर्ण भूमिका निभाई हैं। अगर हम आरएसएस के दूसरे सर संघचालक गुरू गोलवलकर के राजनीतिक विचारों और उनकी अपने समय के राजनीतिज्ञों की आलोचनाओं पर ध्यान दें तो पायेंगे कि आज की भाजपा उनसे शायद ही प्रभावित है।

इससे पहले यह जान लेते हैं कि गोलवलकर दूसरे सरसंघचालक कैसे बनें।

अपनी मृत्यु से एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने गोलवलकर को कागज़ की एक चिट पकड़ाई। जिस पर लिखा था, “इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि अब से संगठन को चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी। ”

शोक के 13 दिनों बाद जब 3 जुलाई, 1940 को आरएसएस के चोटी के नेताओं की नागपुर की बैठक में हेडगेवार की इस इच्छा को सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया तो वहाँ मौजूद सभी नेता अवाक रह गए।
आरएसएस पर बहुत प्रमाणिक किताब लिखने वाले वॉल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले अपनी किताब ‘द ब्रदरहुड इन सैफ़रन’ में लिखते हैं, “आरएसएस के नेता उम्मीद कर रहे थे कि हेडगेवार अपने उत्तराधिकारी के तौर पर एक अनुभवी और वरिष्ठ शख़्स को चुनेंगे।”

गोलवलकर ‘असहमति’ को लेकर क्या कहते थे

‘जब हम अपने महान नेताओं को ये सब बताने लगते हैं तो वे कहते हैं कि देश की इस मुश्किल घड़ी में सरकार की आलोचना न कीजिये’ गुरू गोलवलकर सरकार की आलोचना को देशहित में सबसे ज़रूरी बताते हुए लिखते हैं, ‘क्या वे ये चाहते हैं कि हम उनके हर निर्णय को शत-प्रतिशत सही मान लें? क्या ऐसी चापलूसी से देश का कोई भला हो सकता है? यदि उनकी सारी पालिसी और निर्णय ठीक होंगे तो खुद ही कोई आलोचना नहीं करेगा।
दूसरी ओर अगर उनमें कोई ख़ामी है तो देशभक्त नागरिक होने के नाते यह हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उनको ग़लती का अहसास कराकर उन्हें सही करें.’लेकिन आज की भाजपा अपने आलोचक को देशद्रोही साबित कर पकिस्तान भेज दे रही हैं।

किसी व्यक्ति विशेष की भक्ति से बचें

गुरूजी व्यक्तित्व पंथ या ‘पर्सनेलिटी कल्ट’ के बिलकुल खिलाफ थे। आज यह बात जगज़ाहिर है कि किस प्रकार भाजपा के छोटे-बड़े सभी नेता प्रधानमंत्री मोदी के लिये ‘भक्ति’ की हद तक जा पहुंचे हैं। उनकी मानें तो नरेंद्र मोदी न तो कुछ ग़लत कर सकते हैं और न ही उन्होंने कभी ऐसा किया है।
गुरूजी उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के बारे में लिखते हैं, ‘हम प्रधानमंत्री की इज्ज़त करते हैं और मानते हैं कि वे एक महान वैश्विक नेता हैं. परन्तु हम उनकी चापलूसी नहीं कर सकते, न ही उनके हर कदम को हमेशा सही मान सकते हैं। ’वे आगे जोड़ते हैं, ‘व्यक्तित्व पंथ न केवल हमारे समाज और संस्कृति से बाहर का है, यह राष्ट्र-हितों को नुकसान भी पहुंचाता है।’

आरएसएस पर संकट

आरएसएस के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट तब आया जब गाँधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोलवलकर उस समय चेन्नई (तब मद्रास) में थे जब गाँधीजी की हत्या का समाचार उन तक पहुंचा।

सीपी भिषीकर गोलवलकर की जीवनी में लिखते हैं, “उस समय गोलवलकर के हाथ में चाय का प्याला था, जब किसी ने उन्हें गाँधी की हत्या का समचार दिया। चाय का प्याला रखने के बाद गोलवलकर बहुत समय तक कुछ भी नहीं बोले।
“फिर उनके मुंह से एक वाक्य निकला, ‘कितना बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का!’ इसके बाद उन्होंने अपना बाक़ी का दौरा रद्द कर दिया और पंडित नेहरू, सरदार पटेल को संवेदना का तार भेज कर वापस नागपुर आ गए।”

1 फ़रवरी, 1948 की आधी रात को नागपुर पुलिस ने गुरु गोलवलकर को गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया।
पुलिस जीप की तरफ़ जाते हुए उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था, “संदेह के बादल जल्द ही छँट जाएंगे और हम बिना किसी दाग़ के बाहर आएंगे।

उस बीच उनके एक एक सहयोगी भय्याजी दानी ने आरएसएस की सभी शाखाओं को तार भेजा, “गुरुजी गिरफ़्तार। हर कीमत पर शांत रहें।”
छह महीने बाद आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया गया और गोलवलकर रिहा हो गए। लेकिन इस तथ्य ने आरएसएस को बहुत नुक़सान पहुंचाया कि एक समय नाथूराम गोडसे आरएसएस के सदस्य हुआ करते थे।

कश्मीर के भारत मे विलय में महत्वपूर्ण भूमिका

गोलवलकर कश्मीर के भारत मे विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और सरदार पटेल के कहने पर महाराजा हरि सिंह से मिलने श्रीनगर जाते हैं।
मशहूर पत्रकार संदीप बोमज़ाई अपने एक लेख ‘डिसइक्यिलीब्रियम : वेन गोलवलकर रेसक्यूड हरि सिंह’ में लिखते हैं, “सरदार पटेल के कहने और राज्य के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन के हस्तक्षेप के बाद गोलवलकर श्रीनगर गए और 18 अक्तूबर, 1947 को उन्होंने महाराजा हरि सिंह से मुलाकात की।”

“पंजाब के प्रांत प्रचारक माधवराव मुले ने लिखा है कि महाराजा ने गोलवलकर से कहा, ‘मेरा राज्य पूरी तरह से पाकिस्तान पर निर्भर है। कश्मीर से बाहर जाने वाले सभी रास्ते रावलपिंडी और सियालकोट से गुज़रते हैं। मेरा हवाई अड्डा लाहौर है। मैं भारत से किस तरह संबंध रख सकता हूँ।'”

“गोलवलकर ने उनसे कहा, ‘आप हिंदू राजा हैं। पाकिस्तान के साथ विलय के बाद आपकी हिंदू प्रजा पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा। ये सही है कि आपका भारत के साथ कोई रेल, सड़क या हवाई संपर्क नहीं है, लेकिन इसको बनाया जा सकता है। आपके और जम्मू और कश्मीर के हित में अच्छा यही होगा कि आप भारत के साथ अपने राज्य का विलय कर लें।”

चीन के साथ युद्ध में आरएसएस ने नागरिक प्रशालन में जिस तरह की भूमिका निभाई, उससे नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उसकी एक टुकड़ी को पूरी यूनिफ़ॉर्म और बैंड के साथ 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने गिया गया। 1965 के युद्ध में भी गोलवलकर उन चंद लोगों में से थे जिनसे तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने परामर्थ किया था।

अटल बिहारी वाजपेई उसने इतने प्रभावित थे कि उनकी उपस्थिति में कभी कुर्सी पर न बैठ कर हमेशा ज़मीन पर बैठते थे।लेकिन उनकी मृत्यु पर उन्होंने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, “अपने व्यक्तित्व और विचारों की गहनता के कारण राष्ट्रीय राजनीति में उनकी एक ख़ास जगह थी, हालांकि हममें से बहुत से लोग उनसे सहमत नहीं थे।”

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