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आज सुषमा स्वराज की 69वीं जयन्ती: नवाज शरीफ की माँ से ऐसा क्या वादा किया था कि…

स्वराज

अगर हम देश के सबसे सफल विदेश मंत्रियों की लिस्ट बनाएं तो उसमे शायद सबसे ऊपर नाम आएगा सुषमा स्वराज का। वो सुषमा स्वराज (Sushma Swarajs) जो मोदी सरकार की कैबिनेट में सबसे खास मंत्रियों में से एक रही हैं और साथ ही साथ सुषमा स्वाराज लोगों की बहुत चहेती भी रही हैं। सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 यानी वैलेंटाइन डे के दिन हुआ था। उनकी शख्सियत के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है।

इन्ही कड़ी में आज हम सुषमा स्वराज के कुछ अनोखे पहलुओं पर चर्चा करेंगे

सुषमा स्वराज की उर्दू और पंजाबी में महारत ने नवाज़ शरीफ़ को उनका कायल बना दिया. नवाज़ शरीफ़ के साथ उनकी पत्नी कुल्सुम और बेटी मरियम भी माल्टा आई थीं। अगले दिन नवाज़ शरीफ़ ने सुषमा स्वराज को अपने परिवार से मिलने के लिए आमंत्रित किया।

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जब सुषमा आठ दिसंबर को इस्लामाबाद गईं तो उन्होंने नवाज़ शरीफ़ के परिवार के साथ फिर चार घंटे बिताए। नवाज़ ने एक बार फिर सुषमा की उर्दू की तारीफ़ की और स्वीकार किया कि उनकी पंजाबी पृष्ठभूमि के कारण कभी-कभी उनके उर्दू के तलफ़्फ़ुज़ ख़राब हो जाते हैं। जब वो नवाज़ शरीफ़ की माँ से मिलीं तो उन्होंने उन्हें गले लगाते हुए कहा, “तू मेरे वतन से आई है, वादा कर कि रिश्ते ठीक करके जाएगी।”

नवाज़ शरीफ़ की माँ का जन्म अमृतसर के भीम का कटरा में हुआ था। उन्होंने सुषमा को बताया कि विभाजन के बाद न तो वो अमृतसर गईं और न ही कोई वहाँ से उनसे मिलने आया।

दोनों ने घंटों तक अमृतसर के बारे में बातें कीं। ये वो शहर था जहाँ सुषमा अपने अंबाला के दिनों में अक्सर जाया करती थीं. वहाँ से वापस लौटने से पहले सुषमा स्वराज ने नवाज़ शरीफ़ की बेटी मरियम से कहा था, “अपनी दादी को बता दीजिएगा कि ‘मैंने पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर करने का वादा निभा दिया है।”

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2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे और अपने मंत्रिमंडल गठन के लिए अपने सबसे क़रीबी अरुण जेटली से मंत्रणा कर रहे थे, उन्होंने पिछली लोकसभा में विपक्ष के नेता रहीं सुषमा स्वराज से सलाह करने की ज़रूरत नहीं समझी थी।

कई राजनीतिक पंडितों के साथ-साथ सुषमा को भी पूरा भरोसा नहीं था कि मोदी उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह देंगे भी या नहीं। इसके पीछे दो वजहें थी। एक ये कि वो नेतृत्व की दौड़ में पिछड़ चुके लालकृष्ण आडवाणी के बहुत क़रीब थीं और दूसरे अरुण जेटली से उनकी प्रतिद्वंदिता जगज़ाहिर थी।

उनको नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क़रीबी के तौर पर भी नहीं जाना जाता था। साल 2013 में जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की माँग पहली बार उठाई गई थी तो उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के साथ इसका विरोध किया था। साल 2002 में भी गुजरात दंगों के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी ने नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने के लिए कहा था तो वो वाजपेयी के साथ खड़ी नज़र आई थीं।

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मंत्रिमंडल में उन्हें विदेश जैसा महत्वपूर्ण विभाग ज़रूर दिया गया था लेकिन सरकार में उन्हें राजनाथ सिंह के बाद तीसरे पायदान पर रखा गया था, हालांकि अनुभव और वरिष्ठता में राजनाथ सिंह उनसे कहीं जूनियर थे।

शुरू का उनका कार्यकाल इस मायने में कठिन था कि नरेंद्र मोदी की सक्रिय विदेश नीति का श्रेय उन्हें न मिल कर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को मिल रहा था और सुषमा स्वराज ‘लो प्रोफ़ाइल’ रखे हुए थे। विदेश मंत्रालय में एक साल रहने के बाद जब कुछ पत्रकारों ने उनकी सफलता का राज़ पूछा तो उन्होंने जवाब दिया, ‘मीडिया से दूर रहना और उस काम को करते रहना जिसको करने की उन्हें ज़िम्मेदारी दी गई है।’

सुषमा स्वराज उस समय विवादों में आईं जब उन्होंने विवादों में घिरे ललित मोदी को अपनी पत्नी के ऑपरेशन के लिए ब्रिटेन से पुर्तगाल जाने में मदद की। ब्रिटिश सरकार के पूछे जाने पर कि क्या ललित मोदी को यात्रा के दस्तावेज़ मुहैया करवाए जाएं, स्वराज ने जवाब दिया कि अगर ब्रिटेन की सरकार ऐसा करती है तो इससे भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस मामले को लेकर संसद में बहुत हंगामा मचा और सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की मांग की गई।

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वाजपेयी मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर दिए गए उनके एक बयान की भी तीखी आलोचना हुई कि ‘एड्स से बचने के लिए ब्रह्मचर्य बेहतर है न कि गर्भ – निरोध के तरीके।’लेकिन इसी दौरान लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने राजनीतिक विरोधी होते हुए भी उन्हें भारत का सबसे अच्छा संसदीय कार्यमंत्री घोषित किया था, जिसकी उनकी ख़ुद की पार्टी में भी आलोचना हुई थी।

बेहतरीन वक्ता के रूप में

सुषमा स्वराज को अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बीजेपी के सबसे उत्कृष्ट वक्ताओं में माना जाता था. हिंदी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार रखने वाली सुषमा स्वराज को उनकी वाक्पटुता के लिए जाना जाता था।

साल 2016 में उनके गुर्दों का प्रत्यारोपण हुआ था। 2019 के लोकसभा चुनाव से काफ़ी पहले उन्होंने ये कह कर सनसनी फैली दी थी कि वो ये चुनाव नहीं लड़ेंगी, क्योंकि उनकी सेहत इसकी अनुमति नहीं देती।

चुनाव होने के बाद उन्होंने न सिर्फ़ उन सभी कयासों को विराम लगा दिया जिसमें उनके राज्यसभा में जाने या किसी राज्य का राज्यपाल बनने की बात कही गई थी। बल्कि अपना पद छोड़ने के कुछ दिनों के भीतर ही अपना सरकारी आवास ख़ाली कर निजी मकान में रहने का उन्होंने फ़ैसला किया।

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