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तो नंदीग्राम के अखाड़ें में मीनाक्षी देगी कड़ी टक्कर , क्योंकि अब लोगों में फैक्ट्री न लग पाने का दुख…

नंदीग्राम में राजनीतिक लड़ाई अपनी जगह है, मगर ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं जिन्हें फ़ैक्ट्री ना लग पाने का मलाल है, और उन्हें लगता है कि वाममोर्चा सरकार का इरादा ग़लत नहीं था।

स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता अभिजीत मैती कहते हैं,”फ़ैक्टरी बनने से तो अच्छा ही रहता, हम चाहते थे कि फ़ैक्टरी हो यहाँ, मगर लेफ़्ट फ़्रंट का सिस्टम सही नहीं था, अगर वो एक-एक कर यहाँ कंपनियाँ लाते तो सही रहता, लेकिन वो तो हज़ारों एकड़ ज़मीन लेने लगे, वो सही नहीं था।”

शुभेन्दु अधिकारी के लिए वोट माँगने वाले अभिजीत कहते हैं ‘अगर ये सिस्टम सही रहता तो नंदीग्राम और पश्चिम बंगाल में जो बेरोज़गारी है, वो नहीं रहती’।

नंदीग्राम में तब लेफ़्ट फ़्रंट का विरोध करने वाले ऐसे भी लोग मिलते हैं जो कहते हैं कि बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार सावधानी से क़ाम लेती तो ये नौबत ना आती।

नंदीग्राम के एक स्थानीय निवासी जयदेव दास कहते हैं,” फ़ैक्टरी का ज़रूरत है यहाँ, उनलोगों की ग़लती यही थी कि लोगों को समझाना चाहिए था कि क्या होने जा रहा है और कहाँ से कहाँ तक फ़ैक्टरी होगी।”

बहरहाल, 2011 के चुनाव में परिवर्तन का प्रतीक बना नंदीग्राम एक बार फिर परिवर्तन का पैमाना बन चुका है।

बंगाल एक बार फिर बदलेगा या नहीं, जीत ममता दीदी की होगी या शुभेन्दु दादा की, इस सवाल का जवाब तो दो मई 2021 को मिल जाएगा।

वहीं सत्ता जाने के दस साल बाद वाम मोर्चा पिछले एक-दो सालों में नंदीग्राम में फिर से पाँव जमाने की कोशिश कर रहा है। 2019 में 12 साल बाद सीपीएम ने नंदीग्राम में अपना दफ़्तर फिर से खोला।

पिछले वर्ष लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद भी वामपंथी दल नंदीग्राम में सभाएँ और जुलूस कर रहे हैं।

नंदीग्राम में सीपीएम के नेता परितोष पटनायक कहते हैं,”जिस शुभेन्दु अधिकारी ने कहा था, लाल झंडा पकड़ने वाला कोई आदमी नहीं मिलेगा, आज समय का परिहास देखिए, वो खुद अपनी पार्टी का झंडा छोड़ चुके हैं, आज भगवा झंडा पकड़ चुके हैं, यही होता है इतिहास।”

ये भी पढ़ें-जानिए कैसे वाम मोर्चा चाहती है नंदीग्राम सीट ममता जीत जाए?

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