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तो इस तरह से बंगाल चुनाव में वापसी कर सकती है लेफ्ट, ये अंदर की बात है….

पश्चिम बंगाल : बात 1999 की है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की तूती बोलती थी। लगातार 22 साल से इसकी लगाम थामे मुख्यमंत्री ज्योति बसु बीबीसी के प्रोग्राम हार्डटॉक में पत्रकार करण थापर के सामने बैठे थे। करण थापर ने घुमा-घुमाकर ये सवाल पूछा, “लोग बोर हो गए हैं…वो कह रहे हैं, हमें परिवर्तन चाहिए। “और करण थापर के सवाल को शांति से सुनने के बाद ज्योति बसु ने उल्टा सवाल किया – “पर क्या परिवर्तन? अच्छे के लिए या ख़राब के लिए? अगर अच्छे के लिए चाहिए तो हम एकमात्र विकल्प हैं।” बसु ने अगले साल स्वेच्छा से परिवर्तन के नाम पर गद्दी छोड़ दी। वो तब 86 साल के थे।

बसु के बाद वामपंथी सरकार की कमान बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों में गई। उनकी अगुआई में अगले दो चुनावों में वामपंथियों ने सत्ता बरक़रार रखी। लेकिन आख़िरकार 2011 में वामपंथियों का क़िला ढह गया। आख़िरकार 34 साल बाद पश्चिम बंगाल में परिवर्तन हो गया।

आखिरी समय में बीजेपी से हाथ मिला सकती हैं ममता

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के सबसे बड़े घटक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी या सीपीआई (एम) के विधायक दल के नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं,”लोग बदलाव चाहते थे, उन्होंने कर दिया, पर 10 साल बाद लोगों को महसूस हो रहा है कि तृणमूल कांग्रेस उनके साथ न्याय नहीं कर सकती।”

सीपीआई-एम के महासचिव सीताराम येचुरी ने शुक्रवार को कहा कि यदि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में परिणाम त्रिसंकु रहता है यानी किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो ममता बनर्जी सत्ता में फिर आने के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ गठबंधन कर लेंगी। ममता की ओर से लेफ्ट पर बीजेपी की ‘बी टीम’ होने का आरोप लगाए जाने का जवाब देते हुए उन्होंने इसे काल्पनिक सोच बताया और कहा कि टीएमसी ही ऐसा कर रही है।
इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में येचुरी ने 1990 से लेकर 2000 तक बीजेपी और टीएमसी के बीच गठबंधन की ओर इशारा करते हुए कहा, ”बीजेपी को बंगाल में कौन लाया? यह टीएमसी और मैडम हैं। उन्हें बीजेपी के साथ जाने में कभी संकोच नहीं हुआ।”

लेफ्ट को युवा चेहरा की तलाश

पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के बारे में एक आम धारणा ये भी रही है कि ये बुज़ुर्गों की पार्टी हैं। धारणा को बल तब भी मिलता है जब वो सुनते हैं कि ज्योति बसु ने 86 साल की उम्र में सत्ता त्यागी, और अभी राज्य में वाम मोर्चे का भार जिन विमान बोस के कंधों पर हैं वो भी 82 साल के हैं।
ये सवाल उठने पर सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, “हाँ, ये बात सही है कि हमारे नेता बुज़ुर्ग हैं, पर वो हमारे लिए एक बहुत बड़ी धरोहर हैं, मगर बुज़ुर्ग नेताओं के अलावा हमारे साथ बहुत बड़ी संख्या में नौजवान भी हैं जो ऊर्जावान और दूरदर्शी हैं, तो बुज़ुर्गों का अनुभव और नौजवानों की ऊर्जा मिलकर इस राज्य की दशा बदल देंगे।”

दुविधा में हैं लेफ्ट के वोटर

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 40 प्रतिशत वोट मिल गए, जिसकी बीजेपी ने उम्मीद नहीं की थी। इसके पीछे दो बड़ी वजह थी- एक तो तृणमूल कांग्रेस से नाराज़गी और दूसरा पुलवामा-बालाकोट हमले के बाद बीजेपी के पक्ष में बनी लहर।
इस माहौल में ऐसा कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में लेफ़्ट के मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दे दिए।

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने नतीजे आने के कुछ समय बाद कहा कि उन्होंने बंगाल में खुद ये नारा सुना – ‘एबार राम, पॉरे बाम.’..यानी इस बार राम, बाद में वाम। विश्लेषक बताते हैं इस बार लेफ़्ट वोटर दुविधा में होंगे। वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी कहती हैं कि एक साल से ये चर्चा चल रही थी कि सबको परख लिया तो इस बार बीजेपी को भी परख लें।

शिखा कहती हैं, “बीजेपी के लिए वो समर्थन मोदी के प्रदर्शन से जुड़ा हुआ था, पर अब महामारी और आर्थिक संकट के बाद लोगों के मन में सवाल आ रहा है कि हम उनको लेकर आ भी गए यहाँ क्या फ़र्क़ पड़नेवाला है।”
ऐसे लोगों का वोट इस चुनाव में किस ओर जाता है ये दिलचस्प होगा क्योंकि बकौल शिखा, ‘पश्चिम बंगाल में मतदान का प्रतिशत बहुत ज़्यादा होता है और लोग मत बर्बाद नहीं करते।

तो लेफ्ट में भी मची है भगदड

लेफ़्ट पार्टियों के बारे में माना जाता है कि उनके सदस्य या समर्थक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होते हैं और उन्हें डिगाना मुश्किल होता है।
लेकिन 20 दिसंबर को मिदनापुर में गृह मंत्री अमित शाह की रैली में जिन 11 विधायकों ने भगवा झंडा थाम लिया उनमें सीपीएम के भी तीन विधायक भी शामिल थे।
तामलुक के विधायक अशोक डिंडा, गजोला की विधायक दीपाली विश्वास और हल्दिया की विधायक तापसी मंडल ने अटकलों के बाद आख़िर पार्टी छोड़ दी। हल्दिया की विधायक तापसी मंडल के लिए ये आसान फ़ैसला नहीं था। वो 1997 से ही पार्टी के साथ थीं और चार बार पार्षद रहने के बाद विधायक बनी थीं।

पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए वो कहती हैं कि पार्टी में निचले स्तर के लोगों की बात नहीं सुनी जा रही, शीर्ष नेता अपने फ़ैसलों को थोप देना चाहते हैं। तापसी मंडल ने कहा, “सीपीएम की जो मूल राजनीति थी कि जनता के पास जाकर उनके ही हितों को लेकर आंदोलन करना, वो नहीं हो रहा, अभी बस ऊपर-ऊपर आंदोलन हो रहा है।

मगर अपने विधायकों के बीजेपी में जाने पर पार्टी के प्रदेश सचिव सूर्यकांत मिश्र ने ये कहा – “जिन्होंने सीपीएम छोड़ा उनके ख़िलाफ़ आरोप थे। उनको आख़िर में जाना ही पड़ता क्योंकि उनके ख़िलाफ़ जाँच हो रही थी।”
पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ये स्वीकार करते हैं कि कुछ लोगों ने पार्टी छोड़ी है, मगर वो साथ ही ये भी याद बताते हैं कि पार्टी भी हर साल लोगों को निकाल रही है। ‘इस बार जब विधानसभा चुनाव के पर्चे भरे जाएँगे तब आप देखिएगा कि पुराने पहरेदार कहाँ हैं और नए चेहरे कहाँ हैं।’

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