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Jharkhand: लालटेन की लौ तेज होने से छोटे सरकार नाराज, पढ़ें सियासत की खरी-खरी

Jharkhand Political Updates तीर-कमान हैरान और परेशान हैं। कह रहे हैं हमसे क्या भूल हुई जो यह सजा हमका मिली। खातिरदारी में कोई कमी न रखी। खाने को केला भी दिया। बदले में लालटेन वालों ने ठेंगा दिख दिया।

लालटेन की लौ चुनाव आते ही अचानक इतनी तेज हो गई है कि सहयोगी भी इसके ताप से जले जाते हैं। तीर-कमान हैरान और परेशान हैं। कह रहे हैं, हमसे क्या भूल हुई, जो यह सजा हमका मिली। खातिरदारी में कोई कमी न रखी। केली बंगला भी दिया और खाने को केला भी, बदले में लालटेन वालों ने दिख दिया ठेंगा। खैर जो हुआ सो हुआ, तीर कमान वाले भी एकलव्य के वंशज है। बगैर अंगूठे के भी तीर चला सकते हैं। वैसे भी लालटेन में लीकेज के यहां पूरे चांस नजर आ रहे हैं। तेज की तेजी ने एक फाइल इधर भी खोल रखी है। लालटेन की झारखंड में एकमात्र टिमटिमाती लौ तो कमजोर नस है ही। दबेगी तो दर्द उठेगा। वैसे बोनस में दे दी थी कुर्सी, वापस भी ले सकते हैं। छोटे सरकार खासे नाराज बताए जाते हैं।

जुबानी जमा खर्च

जनाब की संवेदनशीलता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। किसानों पर तो जान छिड़कते हैं माननीय। लेकिन क्या करें दिल में जितनी दया है जेब में उतने पैसे नहीं। फिलहाल जुबानी जमाखर्च से काम चला रहे हैं। सियासत का तकाजा भी यही है। हालात पर रोना भी एक कला है, इस कला में जो जितना माहिर है, उसका झंडा बुलंद है। आप तो हैं ही बादल, ऊपर ही ऊपर बगैर बरसे निकलने का माद्दा रखते हैं। हां, गरज के साथ कुछ छीटें जरुर छोड़ जाते हैं। छह माह में महज पांच करोड़ छींटे हैं। खर्च की बात न करें, घोषणाओं में कोई कमी हो तो बताएं। वैसे खजाने के हालात इतने भी खराब नहीं जितने जनाब बता रहे हैं। पब्लिक सब जानती है।

तनातनी में फंसी कुर्सी

पावर के खेल होते ही निराले हैं। खेलता कोई है और पिसता कोई। खाकी वाले विभाग के मुखिया की कुर्सी रांची-दिल्ली की तनातनी के बीच उलझकर रह गई है। मूंछ की लड़ाई में कौन किसपर भारी पड़ेगा कहना कठिन है। पैनल वालों का अपना चैनल है तो हाकिम की अपनी शान। कानून की किताबें दोनों ही ओर खुल चुकी हैं। शालीनता से दोनों ही खेमों की ओर से एक दूसरे को कर्तव्यबोध का पाठ पढ़ाया जा रहा है। कोई किसी से कम नहीं दिखता। धर्मकांटा का भी पलड़ा बराबर का दिख रहा है। इधर से काम की परिभाषा बताई गई तो पैनल वाले ने दो टूक कह दिया कि तब तो कोर्ट से होकर आएं। दिग्गजों की जंग में कोई पिस रहा है तो वह हैं मुखिया जी, उलझकर रह गए हैं। खींचतान में किसी एक का औंधे मुंह गिरना तय है।

बराबर का मुकाबला

अब नए और बदले माहौल में चुनावी सेमीफाइनल का शंखनाद हो चुका है। मुकाबला बराबरी का है और मौका भी है हावी होने का। इसमें कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। दोनों तरफ से हो रही है लामबंदी। उधर दुश्मनों से जूझने की बजाय अपनों में ही उलझा है तीर-कमान। रोज मैडम के ऐसे-ऐसे बयान आ रहे हैं, जैसे तरकश में भरे हों ढेर सारे तीर। इससे विपक्ष को बैठे बिठाए हथियार मिल रहा है निशाना साधने को। वैसे कहा जा रहा है कि ऐसे दोस्त हों तो दुश्मनों की भला क्या जरूरत है? कुछ इसमें कारस्तानी ढूंढ रहे हैं कमल वालों की तो कुछ उलाहना दे रहे हैं सलाहकारों को। वैसे झारखंड में इस प्रजाति ने कब बेड़ा गर्क नहीं किया है नेताओं का। जिसे देखो, वही देता फिर रहा है सलाह। बाढ़ आ गई मुफ्त में सलाह देने वालों की। ऐसे सलाहकारों के फेर में पहले भी इनमें से कई बड़े घर का दर्शन कर चुके हैं। बदले माहौल में कुछ और की बारी आए तो आश्चर्य नहीं होगा।

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