Bihar

बिहार ने जातिवादी राजनीति का खेल खेलने वालों की कब्र खोदी, मगर वाम आतंकियों का मजबूत होना चिंताजनक…

आज जिस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं, उस वक्त तक बिहार चुनावी नतीजों का एग्जिट पोल के आधार पर पूर्वानुमान लगा रहे तथाकथित विश्लेषकों के मुँह पर जनमत का झन्नाटेदार तमाचा पड़ चुका है। अगर इतने को आप काफी समझ रहे हैं, तो ये संभवतः गलतफहमी होगी।

एक जाने पहचाने से धारावाहिक ‘भाभीजी घर पर हैं’ की लोकप्रियता का अंदाजा तो होगा ही? उसकी ही तर्ज पर बिहार चुनावों का पूर्वानुमान करने वाला एक ‘भाभीजी मैदान में’ जैसा कार्यक्रम अभी बिहार में चल रहा था। तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों के साथ ही इस धारावाहिक की याद इसलिए आ गई क्योंकि इसमें एक किरदार ऐसा था जो अक्सर पीटने के बाद ‘आई लाइक इट’ करता रहता है।

तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग बिलकुल उसी किरदार की तरह आत्मपीड़न में सुख पाता, मुदित होता रहता है। इसके अलावा क्या कारण हो सकता है कि वो अब बिहार चुनावों को तेजस्वी यादव की विजय बताए? इस चुनाव को राजद और उसके संस्थापक तथा सजायाफ्ता अपराधी लालू यादव की विचारधारा के हारने के रूप में ही देखा जा सकता है।

लालू यादव की राजनीति, सामाजिक न्याय के नाम पर एक वर्ग को अपने साथ लाए और इस प्रक्रिया में बिहार से वाम दलों की राजनीति को साफ कर दिया। उनके दौर तक वाम झुकाव रखने वाले आतंकी संगठन कई जातीय नरसंहारों को अंजाम दिया करते थे। लालू यादव की राजनीति ने अपने जातीय समीकरणों को मजबूत करने के लिए उनका सूपड़ा साफ कर डाला।

गौरतलब है कि बिहार में लालू यादव को जिन समुदायों का समर्थन था, उसका एक बड़ा वर्ग कृषि से जुड़ा था। कृषि योग्य भूमि का अधिपत्य भी काफी हद तक इन समुदायों के नियंत्रण में था। ऐसे में शायद ये बाद हजम करना मुश्किल लगे लेकिन राजनैतिक इतिहास को देखते ही ये बात स्पष्ट हो जाती है। ये मंडल-कमंडल की राजनीति का दौर भी था। जिस मंडल कमीशन को आज आरक्षण में ओबीसी वर्ग को जगह दिलवाने के लिए जाना जाता है, उसके प्रमुख बिहार के सहरसा क्षेत्र के ही थे।

उस क्षेत्र के पाँच सबसे बड़े जमींदारों का भी नाम लें तो एक नाम बीपी मंडल के परिवार का भी आता है। आज के दौर के हिसाब से देखें तो बिहार में लालू और उनके तथाकथित सामाजिक न्याय का नतीजा ये है कि सरकारी नौकरियों से लेकर विधानसभा में प्रतिनित्धित्व के आरक्षण तक में आपको ओबीसी समुदाय के लोगों की गिनती अनुसूचित जाति-जनजातियों से कहीं अधिक नजर आ जाएगी।

वाम दलों ने जिन क्षेत्रों में, राजद की मदद से बढ़त दर्ज की है, वहाँ राजद का परंपरागत मतदाता अपनी राजनैतिक जमीन खो बैठा है। राजद की राजनीति के इस नुकसान में भाजपा का योगदान भी कम नहीं रहा। निजी बातचीत में अधिकांश बिहारी मतदाता ये स्वीकार लेंगे कि लोजपा और चिराग की मदद से ऐसे लोगों का जीतना सुनिश्चित किया गया।

लालू के दोनों पुत्रों की जीत का अंतर और उसी क्षेत्र में लोजपा को मिले मतों की गिनती देखते ही ये और स्पष्ट हो जाता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल ये भी है कि क्या नीतीश के ‘एंटी-इनकमबेंसी’ मतों को मोड़ने और नीतीश को दबाकर भाजपा उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा ने ही रामविलास के चिराग का रणनैतिक प्रयोग किया था?

तेजस्वी यादव और राजद की राजनीति की इस रणनैतिक हार में जो दूसरे मुद्दे अहम् भूमिका निभा रहे थे, उन्हें देखने से भी तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों ने साफ़ इनकार कर दिया था। राजद और उसके समर्थक कॉन्ग्रेस की सीटों के घटने और उसका सीधा फायदा भाजपा और उसके समर्थकों को होने की एक बड़ी वजह तेजस्वी की रैलियों की आक्रामक भीड़ थी।

बिहार की 47% के आसपास की आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। इसमें जो युवा मतदाता थे, उन्हें कथित रूप से ‘जंगलराज’ कहलाने वाले दौर का कोई अंदाजा नहीं था। उन्होंने अराजकता का वो दौर देखा ही नहीं था। किस्मत से ये रैलियाँ आयोजित करने वाले वही लोग थे, जो ‘जंगलराज’ में सत्ता सुख भोग रहे थे।

इन रैलियों में वही लक्षण दिखे जो ‘जंगलराज’ में दिखते थे। युवाओं, विशेषकर लड़कियों को रैलियों के दिन घर से निकलने से रोका गया होगा और उन्हें परिवार का ‘भय’ महसूस हो गया होगा। सोशल मीडिया के दौर में फटाफट शेयर हो रहे वीडियो ने भी रैली का आतंक और जंगलराज की बानगी दिखा दी थी। जो थोड़ी सी कसर रहती थी वो तेजस्वी के ‘बाबू साहब’ वाले बयान ने पूरी कर दी।

भले ही भाजपा और जदयू उस बयान को सबको दिखाने में नाकाम रहे हों, लेकिन तथाकथित सेक्युलर लोगों को भी उसका प्रभाव याद आ गया। आखिर अस्सी-नब्बे के दशक में जो लोगों को अपने उपनाम छुपाने पड़े थे, वो किसे याद नहीं? एक कथित सेक्युलर चैनल के ईनामी पत्रकार भी तो अपना नाम ‘कुमार’ तक ही बताते हैं, पूरा नाम नहीं बताते ना? क्यों छुपाना पड़ा था, ये याद तो आता है!

राजनीति को एक दो साल का मामला समझने के बदले दशकों चलने वाली लंबी लड़ाई के तौर पर, या कहिए कि ठीक तरह से देखने वाले अब ये अच्छी तरह समझ रहे हैं कि इस चुनाव ने बिहार से जातिवादी राजनीति का खेल खेलने वाली राजद की कब्र खोद दी है। पक्षकारिता और एजेंडा चलाने वाले इसे स्वीकार करते इसलिए हिचकिचाते हैं क्योंकि ये उनके पक्ष की विजय है।

वाम और उसके आतंकी धड़े का मजबूत होना ऐसे कई पक्षकारों के निजी रुझान के अनुरूप ही है। वाम की सेनाएँ कितने पास तक आ गई हैं, ये राजद और लालू जैसे वाम के पुराने शत्रुओं को जितनी देर से पता चले ये उनके लिए उतना अच्छा ही होगा। जब एक दक्षिणी हाथ पर ध्यान हो तभी तो जादूगर वाम से अपना कमाल दिखा पायेगा! बाकी, तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों को भी चुनावी नतीजों की बधाई देनी ही चाहिए, आखिर धुँध की आड़ में उन्हें अपनी फौजों को चार कदम आगे आने का मौका तो मिला ही है।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top