Bihar

‘बंदर’ शहाबुद्दीन का था आतंक, लेकिन ‘मदारी’ था लालू… हाथ डालने वाले SP से लेकर DGP तक को हटा दिया जाता था

पश्चिमी बिहार में यूपी बॉर्डर से सटा जिला है सिवान। इस जिले ने देश को पहला राष्ट्रपति दिया। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म सिवान जिले के जीरादेई में हुआ था। वे दुनिया भर में अपनी विद्वता और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका के लिए जाने जाते थे। उनके कारण सिवान जिले का नाम पूरे देश में हुआ, लेकिन आज बिहार का सिवान जिला अपराध, राजनीति में अपराधियों के दबदबे, गैंगवॉर और बाहुबलियों के इलाकों और वर्चस्व की जंग के लिए पूरे देश में कुख्यात है।

बिहार में चुनाव का माहौल है तो ऐसे में फिर से धनबल और बाहुबल का जोर है। तमाम दलों के नेता टिकट पाने की जोर आजमाइश में लगे हैं और बाहुबली अपने और अपने समर्थकों का वर्चस्व जमाने में। आज इस जिले में दो बाहुबलियों के बीच का सियासी टकराव चर्चा का केंद्रबिंदु बना रहता है। एक तरफ सिवान के ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर मोहम्मद शहाबुद्दीन का जलवा है तो दूसरी ओर अजय सिंह का रुतबा, जिनकी बीवी कविता सिंह ने शहाबुद्दीन की पत्नी को लोकसभा चुनाव में मात दी थी और अब सिवान की सांसद हैं।

जब लालू प्रसाद के ‘जंगलराज’ में बोलती थी शहाबुद्दीन की तूती
बिहार की बर्बादी और उसके पिछड़ेपन की जब भी कहानी लिखी जाएगी, लालू प्रसाद यादव के ‘जंगलराज’ की चर्चा सबसे पहले होगी। लालू प्रसाद यादव के इस ‘जंगलराज’ में शहाबुद्दीन का आतंक चरम पर था। शहाबुद्दीन और उसके गुर्गों पर कानून का कोई भय नहीं था। वे खुले तौर पर अपनी मनमानी करते थे। क्या मजाल था कि सिवान जिले के लोग शहाबुद्दीन के खिलाफ चले जाएँ।

शहाबुद्दीन को लालू का ‘आशीर्वाद’ प्राप्त था और लालू को इसके बदले चुनाव में वोट मिलते थे। शहाबुद्दीन लालू को अपना सब कुछ मानता था, तो लालू उसे अपनी राजनीतिक नौके का खेवय्या मानता था। व्यापारियों के अपहरण, धन उगाही, हत्या जैसी बातें तो इस अपराधी के लिए आम थीं। लालू की छत्रछाया में इसने न सिर्फ सिवान बल्कि पूरे बिहार में लोगों का जीना दूभर कर दिया। लोग इसके डर से थर-थर काँपते थे।

1980 के दशक तक सिवान की सियासत में आपराधिक तत्वों का बोलबाला था। 1980 के दशक में कई अपराधों में नाम आने के बाद शहाबुद्दीन ने सियासत में एंट्री की और बाहुबल के दम पर दो बार विधायक और 4 बार सांसद रहा। एक दौर था, जब तेजाब कांड हो, चंद्रशेखर हत्याकांड हो या सिवान में कोई भी अपराध, शहाबुद्दीन का नाम हमेशा सुर्खियों में रहता था। जिले के अस्पताल हो, स्कूल हों या बैंक या फिर कोई भी दफ्तर… हर जगह ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर शहाबुद्दीन का कानून चलता था।

19 साल की उम्र में 1986 में दर्ज हुआ था पहला मामला
अपराध की सीढ़‍ियाँ चढ़ते-चढ़ते राजनीति के गलियारे तक पहुँचने वाले शहाबुद्दीन पर हत्‍या, अपहरण, रंगदारी, घातक हथ‍ियार रखने और दंगा फैलाने जैसे दर्जनों मामले दर्ज हैं। शहाबुद्दीन की अपराध की दास्‍तान तब शुरू हो गई थी, जब महज 19 साल की उम्र में शहाबुद्दीन के खिलाफ सिवान के एक थाने में पहला मामला दर्ज हुआ था।

शहाबुद्दीन का सियासी सफर शुरू होने से काफी पहले उनकी दबंगई के चर्चे आम थे। रिकॉर्ड के मुताबिक उस पर पहली एफआईआर 1986 में सिवान जिले के हुसैनगंज थाने में दर्ज हुई थी। उसके बाद उसकी छवि ऐसी बनी कि लोग सरेआम उसका नाम लेने से भी डरते थे। चुनाव लड़ने के दौरान सिवान शहर में शहाबुद्दीन की पार्टी को छोड़कर दूसरे किसी प्रत्याशी का झंडा लगाने की हिम्मत किसी को नहीं होती थी।

सिवान में शहाबुद्दीन का खौफ किस तरह था, इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से भी लगा सकते हैं कि लोग अपने लिए भी खर्च करने से बचते थे। घरों में सभी लोग नौकरी नहीं करते थे। व्यापारी नई गाड़ियाँ नहीं खरीदते थे। क्योंकि, संपन्नता दिखने पर उन्हें “टैक्स” के रूप में उसे रंगदारी देनी पड़ सकती थी। मना करने पर जान तक जा सकती थी। इतना ही नहीं 15 साल पहले तक लोग अपने घरों और दुकानों में उसकी तस्वीर टाँग कर रखते थे। ऐसा इसलिए कि कहीं से भी यह न लगे कि फलाँ उसके विरोध में हैं और उसका सम्मान नहीं करता है।

धीरे-धीरे शहाबुद्दीन सिवान का मोस्ट वांटेड क्रिमिनल बन गया। शहाबुद्दीन पर उसकी उम्र से भी ज्यादा 56 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 6 में उसे सजा हो चुकी है। भाकपा माले के कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता के अपहरण व हत्या के मामले में वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है।

2003 में शहाबुद्दीन को वर्ष 1999 में माकपा माले के सदस्‍य का अपहरण करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वो स्‍वास्‍थ्य खराब होने का बहाना कर सिवान जिला अस्‍पताल में रहने लगा, जहाँ से वो 2004 में होने वाले चुनाव की तैयारियाँ करने लगा। चुनाव में उसने जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी को 3 लाख से ज्‍यादा वोटों से हराया।

इसके बाद शहाबुद्दीन के समर्थकों ने 8 जदयू कार्यकर्ताओं को मार डाला तथा कई कार्यकर्ताओं को पीटा। समर्थकों ने ओमप्रकाश यादव के ऊपर भी हमला कर दिया, जिसमें वे बाल-बाल बचे, मगर उनके बहुत सारे समर्थक मारे गए। इस घटना के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन के ऊपर राज्‍य के कई थानों में 34 मामले दर्ज हो गए।

लालू यादव की छत्रछाया और राजनीतिक शुरुआत
देश में अपराध से आगे बढ़कर राजनीति की दुनिया में कदम रखने वालों कमी नहीं है। शहाबुद्दीन ने भी यही रास्‍ता चुना। बाहुबली शहाबुद्दीन पहली बार राजनीति की गलियों में तब चर्चा में आया, जब लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में उसने जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा। जनता दल में आते ही शहाबुद्दीन की ताकत और दबंगई का पुराना रंग दिखाने लगा। साल 1990 में शहाबुद्दीन को विधानसभा का टिकट मिला और वह जीत गया।

1996 में विधानसभा से लोकसभा पहुँचा
शहाबुद्दीन ने 1995 में भी चुनाव जीता। उसकी बढ़ती ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में लोकसभा का टिकट थमाया और शहाबुद्दीन सांसद बन गया। लालू के खास शहाबुद्दीन को 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन के साथ ही पार्टी में जगह मिली। बिहार में आरजेडी की सरकार और शहाबुद्दीन की ताकत सत्ता के साथ बढ़ गई।

तमाशबीन बनने पर मजबूर हुई पुलिस
साल 2001 की बात है। राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए ‘पीपुल्स यूनियन’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि आरजेडी सरकार शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही है। कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को सरकार का साथ मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों के बावजूद तमाशबीन बनकर खड़ी रहती है। यही नहीं, शहाबुद्दीन के खौफ से उसके ख‍िलाफ न तो एफआईआर होती है और ना ही कोई कार्रवाई।

पुलिस अधिकारियों को पीटने से भी नहीं किया गुरेज, मारा थप्पड़
धीरे-धीरे शहाबुद्दीन पर सत्ता का नशा भी चढ़ गया। कानून को ठेंगा दिखाने वाले शहाबुद्दीन ने अध‍िकारियों के साथ भी मनमानी करनी शुरू कर दी थी। इस बीच कई अधिकारियों से शहाबुद्दीन की मारपीट की भी खबरें आने लगीं। एक बार तो मामला पुलिस वालों पर गोली चलाने का भी आया। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विकास दुबे ने 8 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया था, उसी तरह शहाबुद्दीन भी पुलिसकर्मियों को मार डालता था और उस पर कार्रवाई तक नहीं होती थी।

मार्च 2001 में एसपी बीएस मीणा की अगुवाई में जब पुलिस टीम आरजेडी के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट लेकर पहुँची तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तार करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था। इस मुठभेड़ में 2 पुलिसकर्मी सहित 8 लोग मारे गए थे।

इस घटना ने बिहार पुलिस को झकझोर कर रख दिया। बिहार पुलिस ने तुरंत राज्‍य टास्‍क फोर्स तथा उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ मिलकर मोहम्मद शहाबुद्दीन के गाँव तथा घर को घेरकर हमला कर दिया। इस हमले के बाद दोनों ओर से कई राउंड गोलियाँ चलीं, जिसमें पुलिस वाले सहित कई लोग मारे गए। पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई। हालाँकि मुठभेड़ के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन घर से भागकर नेपाल पहुँच गया।

बताया जाता है कि स्थानीय पुलिसवालों के साथ वह जिस तरह अपमानजनक तरीके से पेश आता था, उससे पुलिसवालों में शहाबुद्दीन के प्रति गुस्सा भरा हुआ था और यह ऑपरेशन उसी का परिणाम था। लेकिन शहाबुद्दीन के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छापे के अगले ही दिन राबड़ी देवी सरकार ने मीणा समेत जिले के सभी वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया।

उस वक्त शहाबुद्दीन गिरफ्त में तो नहीं आया लेकिन पुलिस ने छापे में उसके घर से एके-47 राइफलों समेत हथियारों का जखीरा बरामद किया। इसके बाद शहाबुद्दीन ने यह कहते हुए एसपी को मारने की कसम खाई कि भले ही इसके लिए उसका राजस्थान (एसपी के गृह प्रदेश) तक पीछा करना पड़े।

1996 में एसपी एसके सिंघल पर गोली चलाई, 10 साल की सजा
बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय के वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ) के बाद राज्य सरकार ने आईपीएस अफसर एसके सिंघल को डीजीपी का प्रभार सौंपा है। बता दें कि 1988 रैंक के यह वही आईपीएस अधिकारी हैं, जिन पर 24 साल पहले बाहुबली शहाबुद्दीन ने सिवान में कातिलाना हमला किया था। 1996 में लोकसभा चुनाव के दिन ही एक बूथ पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में उसे गिरफ्तार करने निकले तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर गोलियाँ चलाई गईं। आरोप था कि खुद शहाबुद्दीन ने गोलियाँ दागी और सिंघल को जान बचाकर भागना पड़ा था।

फिर, उस समय केंद्रीय मंत्री बनने की दौड़ में शामिल इस बाहुबली को सबक सिखाने के लिए उन्होंने वर्दी और कानून की ताकत दिखाई थी। नतीजा यह रहा कि उसे दस साल की सजा सुनाई गई और मंत्री बनने का सपना आज तक नहीं पूरा हो सका। इतना ही नहीं कोर्ट से तेजाब कांड के मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। फिलहाल वह 2005 से जेल में सजा काट रहा है।

2003 में शहाबुद्दीन पर डीपी ओझा ने कसा था शिकंजा
मोहम्मद शहाबुद्दीन को लंबे समय तक राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा और आज भी उसके साथ ही है। हालाँकि 2003 में डीपी ओझा ने डीजीपी बनने के साथ ही शहाबुद्दीन पर शिंकजा कसना शुरू कर दिया। उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर कई पुराने मामले फिर से खोल दिए।

इन मामलों की जाँच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा कराई गई। माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण व हत्या के मामले में शहाबुद्दीन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और उसे अदालत में आत्मसर्पण करना पड़ा। शहाबुद्दीन के आत्मसमर्पण करते ही सूबे की सियासत गरमा गई और मामला आगे बढ़ता देख राज्य सरकार ने डीपी ओझा को ही डीजीपी पद से हटा दिया।

ISI से थे संबंध, घर में मिले थे पाक निर्मित हथियार
राज्य के तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने शहाबुद्दीन के आईएसआई से लिंक के बारे में 100 पेज की रिपोर्ट दी थी। तब वह रिपोर्ट देश भर में चर्चा में थी। दरअसल, अप्रैल 2005 में सिवान के तत्कालीन एसपी रत्न संजय और डीएम सीके अनिल ने शहाबुद्दीन के प्रतापपुर स्थित घर पर छापेमारी की थी। उस दौरान पाकिस्तान निर्मित कई गोलियाँ, एके 47 सहित ऐसे उपकरण मिले थे, जिसका इस्तेमाल सिर्फ मिलिट्री में ही किया जाता है।

उसमें नाइट ग्लास गॉगल्स और लेजर गाइडेड गन भी शामिल था। इन उपकरणों पर पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्टरी के मुहर लगे हुए थे। इस घटना के बाद जिले में तनाव ज्‍यादा बढ़ गया, जिसे सँभालने के लिए जिले में कई महीनों तक टास्‍क फोर्स मौजूद रही। शहाबुद्दीन के संबंध न सिर्फ कश्मीर के आतंकवादी संगठनों, बल्कि आइएसआइ और दाऊद इब्राहिम के साथ भी थे।

JNU छात्र संघ के अध्यक्ष की हत्या का आरोप
मार्च 1997 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर को सिवान में तब गोलियों से छलनी कर दिया गया था, जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में नुक्कड़ सभा कर रहे थे। इस हमले में शहाबुद्दीन के बेहद करीबी रहे रुस्तम मियाँ को सजा हो चुकी है।

लगता था कोर्ट, सुनाया जाता था फैसला
सामाज पर शहाबुद्दीन का प्रभाव तो पहले से ही पड़ना शुरू हो गया था। जैसे-जैसे सत्ता का संरक्षण मिलता गया, उसकी ताकत भी बढ़ती गई। शहाबुद्दीन की अदालत काफी सुर्खियों में रही थी। शहाबुद्दीन फिल्‍मी अंदाज में 2000 के दशक तक सिवान जिले में समानांतर सरकार चला रहा था।

वह अदालत की तरह लोगों के लिए फैसले किया करता था। डर की वजह से लोग उसका फैसला तुरंत मान भी लेते थे। सिवान में तब भूमि विवादों का निपटारा, जिले के डॉक्टरों की फीस सब कुछ शहाबुद्दीन के अनुसार तय होता था। साल 2004 में लोकसभा चुनाव से ठीक आठ महीने पहले शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया। मामला 1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या का था।

जिसकी सरेआम पिटाई की, उसी ने 2 बार हराया
अपहरण और हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को 2007 में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद चुनाव आयोग ने उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में वह चुनाव नहीं लड़ सका। ऐसे में राजद ने 2009 और 2014 में शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब को टिकट दिया था, पर निर्दलीय ओम प्रकाश यादव ने 2009 में उन्हें करीब 60 हजार वोटों से हरा दिया था।

इसके बाद 2014 में बीजेपी के टिकट पर ओम प्रकाश ने 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से हीना को हरा दिया। यह वही ओम प्रकाश थे, जिन्हें कभी शहाबुद्दीन ने सरेआम पीटा था। इस समय शहाबुद्दीन की पत्नी राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं।

दो भाइयों को तेजाब से नहलाकर मार दिया
प्रतापपुर गाँव में दो भाइयों को 2004 में तेजाब से नहलाकर मार दिया गया था। ये चंदा बाबू के बेटे थे। घटना में सरकार की भूमिका सिर्फ इसी बात से समझी जा सकती है कि पुलिस ने अपराधियों पर कार्रवाई के बजाय चंदाबाबू के घरवालों को ही कहीं और चले जाने को कह दिया।

10-12 फ़ीट लम्बाई-चौड़ाई वाली जमीन के लिए एक ही परिवार के तीन बेटों की हत्या कर दी गई थी। अगस्त 2004 के पहले सप्ताह में सिवान के गोशाला रोड निवासी चंदा बाबू के निर्माणाधीन मकान में बनी एक दुकान पर असामाजिक तत्वों ने कब्जे की कोशिश की। इसी दौरान दोनों भाइयों की तेजाब डाल कर बेरहमी से हत्या कर दी गई।

घटना में मारे गए दोनों भाइयों की हत्या का चश्मदीद गवाह तीसरा भाई राजीव था। वो इस केस का एकमात्र गवाह था। लेकिन शहाबुद्दीन के खिलाफ वो गवाही न दे पाए, इसलिए कोर्ट में पेशी से पहले ही उसे भी मार दिया गया। इस हत्याकांड ने देश भर को हिलाकर रख दिया था। पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए। मामला विशेष अदालत में पहुँचा और शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा मिली। नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद शहाबुद्दीन जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा।

दो भाइयों की हत्या मामले में पटना हाईकोर्ट ने भी शहाबुद्दीन की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन पटना हाईकोर्ट का फैसला ही बरकरार रखा गया। शहाबुद्दीन के आपराधिक करियर में बहुत साल बाद का ये मामला एक बानगी भर नहीं है। उसके नाम ऐसे कई खौफनाक मामले दर्ज हैं, जबकि कई मामले लोगों ने भयवश दर्ज ही नहीं कराए।

पत्रकार की हत्या, कम्युनिस्ट नेता की हत्या, पुलिस के अफसर को थप्पड़ मारना, रेड मारने आई पुलिस फोर्स पर अंधाधुंध फायरिंग करना, घर में पाकिस्तानी हथियारों का जखीरा, जेलर और जज को धमकाना, रंगदारी वसूलना… कई ऐसे मामले हैं, जो शहाबुद्दीन के दुस्साहस की कहानी कहते हैं। वो अपनी अदालतें भी लगाता था। उसे यह दुस्साहस राजनीतिक रसूख की वजह से मिली।

जेल में शहाबुद्दीन के ठाठ की कहानियाँ भी बाहर आईं। नीतीश कुमार की वजह से ही शहाबुद्दीन जेल पहुँचा था। लेकिन जब 2015 में नीतीश ने लालू के साथ सरकार बनाई, उसे जमानत मिल गई थी। 2016 में जेल से निकलने के बाद 1300 गाड़ियों का काफिला लेकर शहाबुद्दीन सिवान के लिए निकला था।

उसने खुलेआम लालू यादव को अपना नेता बताया और कहा कि नीतीश तो ‘परिस्थितियों के नेता’ हैं। जेल जाने के बाद उसकी पत्नी चुनाव लड़ती रही है। इस चुनाव में भी शहाबुद्दीन एक बड़ा मुद्दा होगा।

ये अपराधी लालू का कितना ‘लाडला’ है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि आरजेडी ने 2019 के चुनाव में भी शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब को अपना उम्मीदवार बनाया था। हालाँकि वो चुनाव जीत नहीं पाई। लालू प्रसाद ने भी एक सभा के दौरान स्वीकार किया था कि सिवान मंडलकारा में बंद रहने के दौरान राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन से उसकी टेलिफोनिक बातचीत हुई थी।

इन 8 मामलों में हुई सजा

2007 में छोटेलाल अपहरण कांड में उम्र कैद की सजा हुई
2008 में विदेशी पिस्तौल रखने के मामले में 10 साल की सजा
1996 में एसपी एसके सिंघल पर गोली चलाई थी, 10 साल की सजा
1998 में माले कार्यालय पर गोली चलाई थी, दो साल की सजा हुई
2011 में सरकारी मुलाजिम राजनारायण के अपहरण मामले में 3 साल की सजा
चोरी की गई बाइक बरामद में 3 साल की सजा हुई
जीरादेई में थानेदार को धमकाने के मामले में 1 साल की सजा हुई
सिवान के तेजाब कांड में उम्रकैद की सजा

ऐसा भी नहीं कि नीतीश कुमार प्रशासन का किसी डॉन के साथ संबंध नहीं रहा। नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के कई विधायक बाहुबली थे, लेकिन उन्हें संरक्षण कम ही मिला। नीतीश ने कानून को अपने तरीके से काम करने की अनुमति दी और पार्टी के विधायकों से जुड़े किसी भी मामले की जाँच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सुनील पांडेय और अनंत सिंह जैसे कई हाई-प्रोफाइल बाहुबली उनकी पार्टी से अलग हो गए।

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