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केजरीवाल ने कहा, दिल्लीवालों के जेहन से निकल रहा है कोरोना महामारी का डर

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का मानना है कि कोरोना महामारी से जूझने में काफी हद तक सफलता मिली है। जून माह तक हालात काफी खराब हो चले थे पर होम आइसोलेशन ने स्थिति संभालने में काफी मदद की। अब हालत यह है कि दिल्लीवालों के जेहन से कोरोना का डर निकल रहा है और अब वे सामान्य जीवन जी पा रहे हैं। सबसे अहम यह कि सरकार के लगातार प्रयासों से दिल्लीवासी जानते हैं कि सामाजिक दूर बना के रखनी है, मास्क लगाना है, हाथ साबुन से धोते रहने हैं फिर भी अगर बीमार पड़े तो उन्हें इलाज मिल जाएगा। कोरोना अस्पतालों में बेड की कोई कमी नहीं है। एप से वे जान सकते हैं कि इलाज के लिए आसपास कहां जाना है।

राजधानी दिल्ली समेत पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। हालांकि, जून की तुलना में दिल्ली के हालात सुधरे हैं। दूसरे राज्यों से भी दिल्ली बेहतर स्थिति में है। क्या आप मानते हैं कि दिल्ली में पीक टाइम निकल गया है?
दिल्ली में जून के महीने में, जब लॉकडाउन खुला, उसके बाद स्थिति गड़बड़ हो गई थी। 23 जून को एक ही दिन में 4000 नए मामले आए थे। उस समय हमने यही किया कि हार नहीं माननी है। विशेषज्ञों के साथ बैठकर इसकी योजना तैयार की। इसमें जहां-जहां, जो-जो कमियां थीं, उनको ठीक करने के लिए जहां-जहां से, जिन-जिन लोगों से मदद की जरूरत थी, उनसे मदद मांगी और कमियों को दूर करने की कोशिश की।
कोरोना मरीज के पूरे चक्र का अगर आप अध्ययन करें तो दो तरह के मरीज दिखते हैं। एक गंभीर और दूसरे हल्के लक्षण वाले। दोनों का चक्र एकदम अलग है। दोनों का इलाज करने का तरीका एकदम अलग है। मान लीजिए कि करोना का एक गंभीर मरीज है, सबसे पहले उसे टेस्टिंग की जरूरत है। फिर, उसे एंबुलेंस की जरूरत है। उसे अस्पताल में बेड की जरूरत है। फिर, उसे आईसीयू बेड या फिर वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है। इस पूरे सिस्टम में कई सारी कमियां थीं। बेड की कमी थी, होटल वालों को बुलाया, उनसे गुजारिश की गई कि बेड दे दीजिए।

निजी अस्पताल वालों को बुलाया, उनके यहां कोविड बेड लगवाए। इस तरह से बेड की संख्या बढ़ी। आक्सीजन सिलिंडर की कमी थी। इसके लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी। उन्होंने आक्सीजन सिलिंडर दिया। आईसीयू बेड के लिए केंद्र ने सेना को भेजकर हजार बेड का अस्पताल बनवा दिया। इस सबसे एक जुलाई से चीजें सुधरनी शुरू हुईं हैं। अब ऊपर वाले की दया से चीजें काफी नियंत्रित हैं।

उपमुख्यमंत्री ने इसी दौरान कहा था कि जुलाई के अंत तक 5.50 लाख मरीज होंगे। इससे काफी घबराहट हो गई थी। यह कैसा आकलन था?
असल में हमारा मुख्य मकसद था कि जनता के सामने सच्चाई रखी जाए। मई के आखिर तक हमारी जितनी प्रेस कॉन्फ्रेंस थीं, उनमें हम कहते थे कि कोरोना से हम चार कदम आगे चल रहे हैं। जितने कोरोना के केस होते थे, सब बताए जाते थे। तब तक स्थिति नियंत्रण में थी। लेकिन केंद्र सरकार की एक वेबसाइट है, जो प्रोजेक्ट करती है कि आगे आने वाले महीने में कितने केस होंगे। उस वेबसाइट के मुताबिक, अगर उस समय की दर पर कोरोना संक्रमण बढ़ता रहता तो 31 जुलाई तक दिल्ली में 5.50 लाख केस होने थे। तो हमारा फर्ज बनता था कि हम जनता को आगाह कर दें कि ऐसा हो सकता है और जब हमने सबके सामने रखा तो बड़ी खुशी की बात यह रही कि सबने दिल खोलकर हमारा साथ दिया कि अब दिल्ली को मिलकर बचाना है।

दिल्ली मॉडल है क्या?
मोटे तौर पर देखें तो दिल्ली मॉडल में पांच चीेजें निकलकर आती हैं। एक तो यह कि होम आइसोलेशन यानी मामूली लक्षण वाले मरीज का घर में रहना सबसे महत्वपूर्ण है। इसे सबसे पहले पूरी दुनिया के अंदर दिल्ली में लागू किया गया। इसके लिए हमने इटली, स्पेन जैसे देशों के हालात का अध्ययन किया। जहां-जहां बहुत ज्यादा मामले आ रहे थे, भयावह हालात थे कि सड़कों पर मरीज पड़े हैं, अस्पताल में बेड नहीं हैं, इस सबमें एक चीज निकलकर आई कि जब भी कोई बीमार होता था, उसे अस्पताल ले जाते थे। यह इतनी बड़ी महामारी है कि लोग बड़े स्तर पर बीमार पड़ रहे हैं। इतने लोगों को अस्पताल में नहीं ले जाया जा सकता। इससे लगा कि इस मॉडल में गड़बड़ है। इसके आधार पर हमने तय किया कि जो हल्के लक्षणों वाले मरीज हैं, उनका घर के अंदर इलाज करेंगे। उनको हमने मुफ्त में ऑक्सीमीटर पहुंचाना शुरू किया। लेकिन ठीक होने के बाद उसे वापस लौटा देना है। हमने तीस हजार ऑक्सीमीटर खरीद लिए। इससे बात बनती चली गई।

उपराज्यपाल इस योजना से शुरू में सहमत नहीं दिख रहे थे।
हां, केंद्र सरकार शुरू से होम आइसोलेशन के खिलाफ थी। बहुत सख्त एतराज था। उन्होंने उपराज्यपाल को कहकर एक आदेश पास करवा दिया, जिससे होम आइसोलेशन बंद हो गया। सौभाग्य से जब बंद किया, उससे एक महीने पहले से दिल्ली में होम आइसोलेशन चल रहा था। इससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को फायदा हुआ था। उन सब लोगों ने केंद्र के इस आदेश का विरोध किया। इसकी वजह से केंद्र सरकार को वह आदेश वापस लेना पड़ा। हमारा मानना है कि होम आइसोलशन अगर ठीक से हो जाए तो बेड बड़ी संख्या में खाली हो जाते हैं। इससे लोग टेस्ट कराते हैं। अभी कई राज्यों के अंदर लोग जांच नहीं करा रहे हैं। डर है उनमें कि अगर कुछ हुआ तो पकड़कर क्वारंटीन सेंटर में डाल देंगे। वहां की हालत बहुत खराब है। जब हालत बहुत खराब हो जाती है तो टेस्ट करवाते हैं। ऐसी स्थिति में मौत का डर हो जाता है। होम आइसोलेशन से इससे छुटकारा मिल जाता है।

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