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“दिल्ली एनसीआर पार्टी” किसान आंदोलन का करेगी विरोध, रविवार 13 दिसंबर, दिल्ली-ग़ाज़ीपुर बॉर्डर – आमने सामने

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दिल्ली अनाथ है, दिल्ली का कोई माँ बाप नहीं, जो चाहे बजा के चला जाता है।

केजरीवाल ने दिल्ली को पूरी तरह से अनाथ बना दिया है। पंजाब के किसान पराली जला कर दिल्ली वालों का सांस लेना दूभर कर देते हैं पर मजाल है कि आज जब वही पंजाब के किसान दिल्ली को बंधुआ बना रहे हैं तो केजरीवाल कुछ बोल दे। वो तो सेवादार बन गया है। जो किसान आंदोलन दिल्ली की नाक में दम कर रखा है, उसका ये सेवादार बना हुआ है। ये है दिल्ली का माई बाप?

दिल्ली वालों ने क्या गुनाह किया है।

दिल्ली एनसीआर भारत में सबसे ज्यादा जीडीपी देती है। बहुत बड़ा मिडल क्लास दिल्ली एनसीआर में रहता है। उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा दिल्ली में कार्यरत है। दिन रात मेहनत करता है, टैक्स देता है। उसी टैक्स से इन किसानों को फ्री की चीजें मिलती हैं। कहावत है “हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ”

बीजेपी और नरेंद्र मोदी किसानों के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे, उनका वो अन्नदाता है, वोट बैंक है। किसान इसका गलत फायदा उठा रहें हैं।

हम मेहनत करते हैं, टैक्स देते हैं और हमको ही सबसे ज्यादा परेशानी। जीना दूभर कर दिया है

किसान आंदोलन ने दिल्ली एनसीआर में आम जीवन को अस्त व्यस्त कर दिया है। कड़ी मेहनत करने वाले दिल्ली क्षेत्र के तमाम लोग मुश्किल का सामना कर रहें हैं। किसानों ने तो अपनी फसल बो ली है और वे फुरसत में हैं। ये किसान अन्न दाता नहीं , आलसी लोग हैं। साल में 4-5 महीने काम , बाकी रिश्तेदारियाँ और आराम। सरकार को गाली देना और फ्री की चीजें मांगते रहना। आज किसान कौन है? वही जो और कुछ नहीं कर पाया। ये सब “लेफ्ट ओवर्स” हैं। हाँ हमारे पिताजी, हमारे पूर्वज किसान थे, लेकिन वह पुरानी बात है। वक्त के साथ जो नहीं बदलेगा उसका हश्र खराब होना ही है।

किसान आंदोलन बदलाव के विरोध का आंदोलन है। यह आगे बढ़ने वालों के विरोध का आंदोलन है। ये किसान, जो आज के “लेफ्ट ओवर्स” हैं, ये जिंदगी में हारे हुए लोग देश को दिशा देंगे? नहीं। इनको देश के ज्यादा समझदार और सफल लोगों द्वारा दिखाई गई दिशा में चलना चाहिए।ये किसान उसी व्यवसाई को गालियां देता है जिसका खाता है। उद्यमियों का सम्मान होना चाहिए। वही देश को और इन पिछड़े हुए किसानों को भी आगे बढ़ाने का काम कर रहें हैं।

मेरी समझ के अनुसार आम लोगों की सहानभूति “बुजुर्ग किसानों” के प्रति है क्योंकि वे उनमें अपने माँ-बाप देखते हैं। आम लोग “नौजवान किसान” के साथ नहीं हैं। इस बात को समझना होगा। ईमोशनल कनेक्ट सबका है किसान के साथ लेकिन इकनॉमिक कनेक्ट नहीं हैं।

मेरे गाँव में सबसे ज्यादा जमीन एक तिवारी जी के पास थी। मेरे बचपन में उनकी बहुत इज्जत और रुतबा था। आज सिर्फ 40 सालों में उनकी हालत सबसे खराब है। ऐसा इसलिए हुआ कि उनके बच्चे पढे लिखे नहीं और हम सब पढ़ लिख कर बाहर शहर और विदेशों में या गए। आज भी हमारे माँ बाप किसान हैं लेकिन आमदनी तो शहर से ही जा रही है। यह सब न्यू ईकानमी की बदौलत है। देश आगे बढ़ रहा है और पिछड़े हुए किसान सब को पीछे खीचना चाहते हैं।

किसी सरकार और किसी पार्टी में दम नहीं की इन्हें आईना दिखा सके। देश को आगे बढ़ना है तो ये सब बदलना पड़ेगा। सिर्फ 10% -15% लोग खेती करें और बाकी सब इंडस्ट्री में काम करें, बिसनेस करें। गाँव छोड़कर शहर आयें मेहनत करें, अपना आज और कल सवारें। विरोध नहीं, सहयोग और मेहनत से भारत देश आगे बढ़ेगा।

किसानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि हम नौकरी पेशा वालों का किसानी से गहरा नाता है। हम सब किसान थे, हम आगे बढ़े हैं, आप भी आगे बढ़िए।

हमारी मांगे

1- सारे दिल्ली बॉर्डर्स तुरंत खोलें जाएं।
2- सारे देश से उपज के अनुपात में खरीद हो। कानून में सरकार संसोधन लेकर आए। सिर्फ पंजाब और हरियाणा से 70% खरीद क्यों?
3- किसान आंदोलन की फाइनैन्सिंग की जांच हो।
4- दिल्ली सरकार ने किसान आंदोलन पर कितना खर्च किया है, इसकी जांच हो और सार्वजनिक किया जाए।
5- भविष्य में कोई भी कोई आंदोलन दिल्ली और दिल्ली वालों को बंधक नहीं बना सकती, एक कानून लाया जाए।

यदि हमारी मांगे ना मानी तो ?

हम दिल्ली एनसीआर के लोग काम काजी लोग हैं। हमारे पास इतनी फुरसत नहीं कि हम धरना प्रदर्शन कर सकें, लेकिन हम रविवार 13 दिसंबर को ग़ाज़ीपुर दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के आमने सामने एक दिन का धरना देकर दिल्ली एनसीआर के लोगों का दर्द किसानों के सामने रक्खेंगे। सरकार भी सुने और केजरीवाल भी सुने।

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