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लेह और कारगिल की सियासत में फंसी कांग्रेस बिखरने की कगार पर

लद्दाख में लेह और कारगिल की सियासत में फंसी कांग्रेस बिखरने की कगार पर है। पार्टी के कारगिल और लेह के नेता आमने-सामने आए गए हैं। पार्टी की कारगिल इकाई के नेताओं ने पांच अगस्त को काला दिवस मनाया तो लेह के दिग्गज नेता इस्तीफा देकर चलते बने। लेह और कारगिल कांग्रेस में सामजस्य तक नहीं बन पा रहा है। अब तो पार्टी की कारगिल इकाई कश्मीर केंद्रित नेशनल कांफ्रेंस के साथ अनुच्छेद 370 हटाए जाने के खिलाफ मुहिम में शामिल हो गई है। कारगिल कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 हटने के एक साल पूरा होने पर पांच अगस्त को काला दिवस मनाया था। इसके बाद लेह में कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता इस्तीफा दे चुके हैं।

वीरवार को कांग्रेस महासचिव रिगजिन स्पालबार ने तो कुछ दिन पहले पार्टी उपाध्यक्ष टी सैंफल ने इस्तीफा दे दिया था। इन नेताओं ने कांग्रेस हाईकमान को पत्र लिखकर कहा है कि वे काला दिवस मनाने वाले लद्दाख कांग्रेस के कार्यवाहक प्रधान असगर अली करबलाई के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते हैं। इस मुद्दे पर कुछ अन्य नेता भी इस्तीफा देने की सोच रहे हैं। स्पालबार का कहना है कि उन्होंने करबलाई की बयानबाजी, काला दिवस मनाने के विरोध में इस्तीफा दिया है। करबलाई कांग्रेस के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। उन्होंने काला दिवस मनाने के दो सप्ताह बाद भी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कुछ नहीं किया है। हम पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि करबलाई के खिलाफ हैं।

करबलाई ने पार्टी की ही कराई थी किरकिरी
असगर अली करबलाई ने लद्दाख में कांग्रेस के लिए असहज पहले भी पैदा कर चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार रिगजिन स्पालबार के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था। इससे कांग्रेस की खूब किरकिरी हुई थी। कांग्रेस हार गई थी। तब भाजपा ने 42,914 वोट हासिल कर सीट जीती थी। स्पालबार को 21,241 व करबलाई को 29,365 वोट मिले थे।

लेह और कारगिल में छत्तीस का आंकड़ा
लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस हाईकमान ने करबलाई को लद्दाख कार्यवाहक प्रधान बना दिया। इस फैसले से लेह में नाराजगी है। अब तो कांग्रेस की कारगिल इकाई पार्टी के सभी निर्देशों को ठेंगा दिखाकर नेशनल कांफ्रेंस के साथ मिलकर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने में विरोध में शामिल हो गई है। बड़ी बात यह है कि काला दिवस मनाने के बाद भी हाईकमान ने कोई कार्रवाई नहीं की है।

अपना घर नहीं संभाल पा रही कांग्रेस
कभी लद्दाख में दबदबा रखने वाली कांग्रेस के लिए यहां अब अपना घर संभालना मुश्किल हो रहा है। कारगिल कांग्रेस के नेता लेह में कांग्रेसी नेताओं के साथ सामजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं। वहीं, जन उम्मीदें पूरी करने की केंद्र सरकार की मुहिम के कारण भाजपा सशक्त हो रही है। जुलाई के बाद से लद्दाख में कांग्रेस के कई नेता व कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

शहीदों का मजाक उड़ा चुकी है कांग्रेस
जून में कारगिल कांग्रेस के नेता व कारगिल हिल काउंसिल के पार्षद जाकिर हुसैन ने गलवन घाटी में शहीदों का मजाक उड़ाया था। तब कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। जाकिर का एक आडियो वायरल हुआ था। इसमें उन्होंने अपने दोस्त के साथ फोन पर बातचीत में लद्दाख में चीन से विवाद को लेकर आपत्तिजनक बातें की थीं। पुलिस ने मामला भी दर्ज किया था। हालांकि, बाद में जाकिर ने स्पष्टीकरण दिया था कि वह भारतीय हैं और हमेशा भारतीय रहेंगे।

1996 तक सबसे मजबूत थी कांग्रेस
कांग्रेस वर्ष 1996 तक लद्दाख की सबसे मजबूत राजनीतिक पार्टी थी। कांग्रेस ने यह संसदीय सीट चार बार जीती। भाजपा ने इस सीट को दो बार व नेशनल कांफ्रेंस ने एक बार जीता है। लेह में भाजपा की हिल काउंसिल बनने से पहले कांग्रेस ही हिल काउंसिल बनाती आई है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति भाजपा से हमेशा मजबूत रही है।

कांग्रेस दिशाहीन हो गईः दोरजे आंगचुक
लद्दाख में कांग्रेस का बुरा हाल है। लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पार्टी दिशाहीन हो गई है। लोगों की उम्मीदें पूरा होने के बाद भाजपा का सशक्त होना भी इस पार्टी के नेताओं को हताश कर रहा है।

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