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बंगाल में ममता का खेल बिगाड़ेगी कांग्रेस, लेफ्ट और ISF गठबंधन

लेफ्ट और ISF गठबंधन

लेफ्ट और ISF, कांग्रेस गठबंधन: 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों को सिर्फ 12 फीसदी वोट मिले थे और इनके दो ही सांसद लोकसभा तक पहुंच पाए थे। लेकिन, फुरफुरा शरीफ वाले मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ आने के चलते इन्हें लगता है कि हाल के वर्षों में इनकी जो सियासी जमीन खिसक गई है, उसे काफी हद तक वो वापस पा सकेंगे। लेकिन, तस्वीर इतनी साफ भी नही है। अभी यह देखना है कि हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है और उसका मुस्लिम वोट बैंक पर प्रभाव क्या पड़ता है?

दरअसल, 2016 के विधानसभा चुनाव के बाद से बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ही पार्टियों का ग्राफ डाउन हुआ है जबकि बीजेपी की राजनीतिक ताकत बढ़ी है। पंचायत चुनाव हो या फिर 2019 का लोकसभा चुनाव, बीजेपी राज्य में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है। लोकसभा में बीजेपी 18 सीटें और 40 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही है। वहीं, कांग्रेस महज 2 सीटें और 5.67 फीसदी वोट पा सकी है जबकि लेफ्ट को 6.34 फीसदी वोट मिले, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।

यही वजह है कि कांग्रेस और वाम मोर्चा ने यह फैसला सोच-समझकर लिया है। दोनों दल इस बात को बखूबी जानते हैं कि अगर टीएमसी या बीजेपी में से कोई भी सत्ता मे आया तो बंगाल पर उनकी सियासी पकड़ और भी कमजोर हो जाएगी और सत्ता में वापसी का सपना सिर्फ सपना ही बनकर रह जाएगा।

हालांकि, पिछले चुनाव में कांग्रेसऔर वाम मोर्चा का गठबंधन टीएमसी को सत्ता में आने से नहीं रोक पाया था। इसके बावजूद दोनों साथ आए हैं, ऐसे में उनके सामने अपने पिछले प्रदर्शन को सिर्फ़ बरकरार रखने की नहीं बल्कि उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है। लेफ्ट और ISF, कांग्रेस गठबंधन से ही यह मुमकिन हो सकता है।

मुस्लिम वोटों का गणित

अगर बंगाल में पिछले कुछ चुनावों का ट्रेंड देखें तो खासकर दक्षिण बंगाल में 2011 से मुस्लिम वोट की सबसे ज्यादा फसल तृणमूल कांग्रेस को काटने का मौका मिला है। मुस्लिम धार्मिक नेता और प्रभावशाली मौलानाओं ने खुलकर ममता बनर्जी की सरकार और उनकी पार्टी का समर्थन किया है। इसके बदले में इस समुदाय को राज्य सरकार से तरह-तरह की सुविधाएं भी मिली हैं, जिसके चलते खासकर बीजेपी उसपर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है। इसके ठीक उलट उत्तर बंगाल के मुस्लिम-बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर कांग्रेस का गढ़ रहा है और यहां से अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीतकर लोकसभा में दाखिल हुए हैं। उनकी बहरामपुर सीट मुर्शिदाबाद जिले का ही मुख्यालय है।

बीजेपी करेगी ध्रुवीकरण की कोशिश पश्चिम बंगाल में विधानसभा की 294 सीटों के लिए चुनाव होने हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्यकाल 26 मई, 2021को खत्म हो रहा है। 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीती थी। जबकि कांग्रेस को 44, लेफ्ट को 26 और बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिली थी। बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत है। बीजेपी की नजर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर टिकी है और वह 200 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। अब देखने वाली बात है कि वह मुस्लिम वोट बैंक के लिए अपनी विरोधी पार्टियों की लड़ाई को किस तरह से अपने हक में ध्रुवीकरण करवा पाती है।

पिछले पांच सालों में पश्चिम बंगाल के सियासी हालात काफी बदल गए हैं। मौजूदा विधायकों के पाला बदलने की वजह से कांग्रेस के पास फिलहाल 23 विधायक ही बचे हैं। जबकि बीजेपी के पास 16 विधायक हैं। बंगाल में बीजेपी के जबरदस्त राजनीतिक उभार के चलते कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के सामने अपने-अपने सियासी आधार को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।

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