Delhi

राहुल गाँधी की आँखो में सेक्युलर सितारा बनने की चाह में हरीश ‘फ़ूड ब्लॉगर’ रावत ने उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी को संघी टोपी बताया

‘चोर जो चोरी करता तो कम पिटता बाप का नाम बताकर और पिटा’ – यह एक मशहूर कहावत है, लेकिन उत्तराखंड में अपनी पार्टी-लाइन की विचारधारा की भाँग बोने को आतुर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, पार्ट टाइम फ़ूड ब्लॉगर और कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता हरदा उर्फ़ हरीश चंद्र सिंह रावत जी का यह डिलीट किया हुआ फेसबुक पोस्ट इसका एक नायाब नमूना है।

पिछले विधानसभा चुनावों में दोनों विधानसभा सीट से हारने वाले कॉन्ग्रेसी नेता हरीश रावत ने शनिवार (अक्टूबर 10, 2020) की शाम फेसबुक पर एक दीक्षांत समारोह की तस्वीर, जिसमें कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी मौजूद थे, शेयर की और इसमें मौजूद लोगों द्वारा पहने गए परिधान को ‘भगवाकरण’ से जोड़ दिया। इससे पहले कि राज्य के सांस्कृतिक गौरव के अपमान की इस ‘उपलब्धि’ को राहुल गाँधी को दिखाकर अपने नम्बर बढ़ाते, उन्हें अज्ञात कारणों से यह पोस्ट डिलीट करनी पड़ी।

पारम्परिक परिधान, संस्कृति और खादी के प्रचार के उद्देश्य से UGC द्वारा यह राय दी गई थी कि लोग औपनिवेशिक काल की परम्परा से हटकर अपनी संस्कृति से जुड़े परिधान पहनकर ही दीक्षांत समारोह में आएँ और सभी विश्वविद्यालय अपने रीजनल अटायर में दीक्षांत समारोह करें। BHU से लेकर,मुंबई, झारखण्ड आदि के विश्वविद्यालयों ने इस परम्परा का अनुसरण किया।

लेकिन कॉन्ग्रेस के खानदान विशेष की पार्टी लाइन से हरदा कैसे बगावत करते? जाली वाली टोपी के प्रेम में ‘हरदा’ अपने राज्य की पारम्परिक सांस्कृतिक पहचान को भूलकर उसे संघी बता देते हैं। हरदा सफ़ेद और हरे के प्रेम में इतना डूब चुके हैं कि वह अपनी संस्कृति का उपहास बनाने तक का मौका नहीं चूक रहे।

अक्सर देखा गया है कि कॉन्ग्रेस के ‘भारत तोड़ो’ प्रोजेक्ट के कमांडरों के सिपहसालारों की फेहरिश्त में हरदा भी स्थान रखते हैं। हरदा जिस टोपी को देखकर हिन्दू घृणा और कदाचित अवचेतन में समेटी पहाड़ियों के प्रति नफ़रत से भर उठे, जिसका सीधा तार भगवाकरण व आरएसएस से जोड़ कर ‘फेक न्यूज़’ फैलाने लगे, दरअसल वह सदियों से पहने जाने वाला उत्तराखंड राज्य का परिधान पहाड़ी टोपी है, जिस पर ‘नेहरू कैप’ का पर्चा भी कॉन्ग्रेस ने ही लगाया था।

बाइस इंची इस पहाड़ी टोपी को स्वयं हरदा कई बार पहन चुके हैं। ख़ास बात यह है कि हरदा को पहाड़ी टोपी के बजाए जालीदार टोपी का स्मरण अधिक रहता है। जिसकी अपनी टोपी में छेद ही छेद हों उनको दूसरों की टोपी पर बात नही करनी चाहिए। हरीश रावत इस पारम्परिक पहनावे का पहले भी अपमान कर चुके हैं।

पहाड़ो के गाँव में आज भी बुजुर्ग यह टोपी पहनते हैं। उन्होंने कभी आरएसएस की शाखा में हिस्सा नहीं लिया। वो नेहरू के नाम से भी परिचित नहीं हैं। बस सुबह उठकर सबसे पहले इस टोपी को अपने सर पर रखकर अपनी खेती और किसानी की दैनिक दिनचर्या में लीन हो जाते हैं।

लेकिन हरदा की दिनचर्या इससे हटकर है। किसान वो हैं नहीं और सांस्कृतिक गौरव के सम्मान की इजाजत उन्हें उनकी पार्टी लाइन देती नहीं! उनकी आस्था जिस परिवार की मिट्टी में बसती है, उसकी चरणधूल को किसी सुबह अगर वो अपने सर रखना भूल जाएँ तो यह चौंकाने वाली बात अवश्य होगी। यही वजह है कि राज्य की संस्कृति पर किए गए इस हमले के कुत्सित प्रयास पर माफ़ी माँगने के बजाय हरदा ने एक और जहर बुझा पोस्ट किया और अब भी पारम्परिक परिधान को आरएसएस से जोड़ते नजर आए –

भगवा से नफ़रत क्यों?
पहली बात यह कोई आरएसएस की सभा नही है, जैसा हरीश चंद्र सिंह रावत जी ने ख़ुद माना है और अगर यह किसी विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह है तो उसमें पारंपरिक परिधान पहनने में किसी को भी चनुने काटने जैसी कोई आपत्ति हो यह बौखलाहट से ज्यादा कुछ भी नहीं।

हरदा के हिसाब से यह तस्वीर लखनऊ में दिखाई जाए तो आरएसएस की सभा प्रतीत होगी। अच्छा! तो इस ‘कु’तर्क से बनारस हिंदू विश्विद्यालय का साड़ी, धोती कुर्ता, पगड़ी पहनकर दशकों से होने वाला दीक्षांत समारोह आरएसएस का सदस्यता अभियान ठहरता है। इस व्यापक भगवाकरण का जिम्मेदार कॉंग्रेस नहीं? अगर नहीं तो अब किसी राज्य के किसी विश्विद्यालय द्वारा पारंपरिक परिधान में दीक्षांत कराने पर आखिर इतनी हायतौबा क्यों।

राहुल गाँधी की भक्ति में उसी मानसिक स्तर तक पहुँच गए हरदा
हरीश रावत का सोशल मीडिया प्रोफाइल अगर आप देखेंगे तो यही नजर आता है कि अधिकतर समय वो पार्टी के हमेशा से ही ‘पीएम इन वेटिंग’ रहे राहुल गाँधी के पोस्ट शेयर करते हैं या फिर उनके नाम का ही कलमा बाँचते नजर आते हैं। इसके अलावा वो एक काम और भी करते देखे जाते हैं और वो है ‘फ़ूड ब्लॉगिंग’ का। आखिरी बार जब हरीश रावत फ़ूड ब्लॉगिंग के लिए मशहूर हुए थे, तब वो ‘लाल पानी से विकास का रास्ता’ निकालते देखे गए थे।

आज हरीश रावत ने राहुल गाँधी के मानसिक स्तर का पोस्ट भी कर दिया और उसे डिलीट भी कर दिया। रावत जी ने एचएनबी मेडिकल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का फ़ोटो शेयर करते हुए इसे RSS की सभा कहा है। गौर से देखने का निवेदन भी किया।

इस निवेदन और अपने पुर्वग्रह में हरदा भूल जाते हैं कि ये टोपी उत्तराखंड के पारम्परिक पहनावे का हिस्सा है जो गढ़वाल और कुमाऊँ, दोनों जगह समान रूप से पहनी जाती है। पोस्ट जिस वजह से भी डिलीट किया गया हो लेकिन हर जगह RSS को देखने, भगवाकरण हो जाने का भय हरदा अपने मन से हटा नही पा रहे हैं। यह रह-रहकर यदाकदा दिख ही जाता है, वो भी बिना गौर किए हुए।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WHATS HOT

Most Popular

To Top