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पश्चिम बंगाल-केंद्र में खींचतान, आईपीएस अधिकारियों को डेपुटेशन पर भेजने से राज्य सरकार का इनकार

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल में सेवारत भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के तीन अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवा देने के लिए शनिवार को एकतरफा तरीके से तलब किया. अधिकारियों ने यह जानकारी दी.

उल्लेखनीय है कि यह कार्रवाई राज्य में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले और पार्टी द्वारा सुरक्षा में लापरवाही के आरोप लगाए जाने के कुछ दिन के भीतर हुई है. अधिकारियों ने बताया कि तीनों अधिकारी भाजपा अध्यक्ष की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर क्षेत्र के सिराकोल में बृहस्पतिवार को कथित टीएमसी कार्यकर्ताओं ने नड्डा के काफिले पर पत्थर फेंके, जब वह एक रैली को संबोधित करने के लिए वहां जा रहे थे.

भाजपा के सूत्रों ने दावा किया कि इसमें कैलाश विजयवर्गीय सहित कई भाजपा नेताओं को चोटें आई हैं.

तीनों आईपीएस अधिकारियों – भोलानाथ पांडे (पुलिस अधीक्षक, डायमंड हार्बर), प्रवीण त्रिपाठी (पुलिस उप महानिरीक्षक प्रेसिडेंसी रेंज) और राजीव मिश्रा (अतिरिक्त महानिदेशक, दक्षिण बंगाल)- को नौ और 10 दिसंबर को भाजपा अध्यक्ष नड्डा की राजनीतिक रूप से संवेदनशील पश्चिम बंगाल की यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय के इस कदम से पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी नीत सरकार और केंद्र की भाजपा नीत सरकार के बीच दो दिन पहले नड्डा के काफिले पर हुए हमले के पैदा हुई खींचतान और बढ़ेगी.

गृह मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि तीनों आईपीएस अधिकारी पश्चिम बंगाल कैडर के हैं और उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में सेवा के लिये बुलाया गया है.

इन अधिकारियों को उन चूकों की वजह से बुलाया गया है, जिनकी वजह से नड्डा के काफिले पर हमला हुआ. उन्होंने बताया कि यह फैसला अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों पर लागू होने वाली नियमावली के तहत लिया गया है.

अदालत में जा सकता है मामला

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी लोकसभा सांसद सौगात राय ने कहा, ‘केंद्र केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए नाम मांग सकता है. लेकिन यह तय करना राज्य का काम है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आईपीएस या आईएएस अधिकारियों को अनुमति दी जाए या नहीं. कोई अन्य विकल्प नहीं है. रिक्ति होने पर ऐसा होता है.’

उल्लेखनीय है कि सामान्य तौर पर अखिल भारतीय सेवा के किसी अधिकारी को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाने से पहले संबंधित राज्य की सहमति ली जाती है. हालांकि, केंद्र के पास किसी भी आईपीएस अधिकारी को बुलाने की शक्ति नहीं है.

आईपीएस कैडर नियम, 1954 के नियम 6 के तहत, भारत सरकार के साथ एक अधिकारी की प्रतिनियुक्ति पर केंद्र और राज्य के बीच असहमति के मामले में, केंद्र की इच्छा मान्य होती है.

‘एक कैडर अधिकारी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की सहमति के साथ, केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार या किसी कंपनी के अधीन सेवा के लिए प्रतिनियुक्त हो सकता है. बशर्ते कि किसी भी असहमति के मामले में, इस मामले का फैसला केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा और केंद्र सरकार के निर्णय को प्रभावी होंगे.’

हालांकि, देश के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए केंद्र मुश्किल से ही ऐसे आदेश का इस्तेमाल करता है. आम तौर पर केंद्र हर साल राज्यों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अधिकारियों की सूची के लिए लिखता है. अधिकारियों की इच्छा (राज्य पर बाध्यकारी नहीं) के आधार पर, राज्य सरकारें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए “प्रस्ताव सूची” भेजती हैं. इसके बाद भारत सरकार तय करती है कि प्रस्तावित सूची में से किस अधिकारी को कहां तैनात किया जाएगा. इस वर्ष केंद्र ने राज्यों को 2021 के लिए प्रस्तावित सूची के लिए 7 दिसंबर को लिखा था.

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