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बंगाल फ़तह करने के लिए इस तीन फार्मूले पर काम कर रही है बीजेपी

बंगाल फ़तह

बीजेपी इस बार बंगाल में ‘पोरिबोर्तोन’ यानी परिवर्तन (बंगाल फ़तह) का दावा कर रही है। इसी नाम से पाँच रैलियाँ भी बीजेपी ने निकाली। केंद्र के बड़े-बड़े नेता इन रैलियों को हरी झंडी दिखाने पहुँचे।

लेकिन जिस पार्टी को साल 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 294 सीटों में से मात्र तीन सीटें मिली थीं, वो किस बिना पर इतना बड़ा दावा कर रही है।

दरअसल इसके पीछे का गणित 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में छिपा है।

इस चुनाव में बीजेपी को 18 सीटें और ममता बनर्जी को 22 सीटों पर जीत मिली थी।
लेकिन विधानसभा के लिहाज़ से देखें तो 121 विधानसभा सीटों पर बीजेपी को बढ़त थी और 164 सीटों पर टीएमसी को बढ़त थी। बीजेपी को 40 फ़ीसद वोट मिला था तो दूसरी तरफ़ टीएमसी को 43 फ़ीसद। यानी दोनों के बीच केवल तीन फ़ीसद वोट का अंतर था।

चुनाव आँकड़ों का विश्लेषण करने वाले और सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवेलपिंग सोसाइटीज में प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं, “जब जीतने और हारने वाली पार्टियों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर इतना कम होता है, तो ये नहीं कहा जा सकता कि बीजेपी किसी सीट पर बहुत आगे है और किसी सीट पर बहुत पीछे है। ऐसा हो सकता है कि मुस्लिम इलाक़ों में बीजेपी का वोट प्रतिशत थोड़ा कम हो और हिंदू इलाक़ों में थोड़ा ज़्यादा हो, लेकिन कमोबेश हर इलाक़े में वोट का पैटर्न एक सा ही होता है।”

ये बीजेपी के जीत के दावे की सबसे बड़ी वजह है।

हिंदू वोट की राजनीति
लेकिन ये भी सच है कि अमूमन पार्टी का वोट शेयर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बराबर नहीं रहता है। ये ज़्यादातर बराबर तब रहते हैं जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव छह महीने के अंतराल में हो। विधानसभा चुनाव में वोटों का बंटवारा भी लोकसभा के चुनाव के मुक़ाबले कम होता है। इसलिए विधानसभा चुनाव में पार्टी के वोट प्रतिशत में गिरावट देखने को मिलता है।

प्रोफ़ेसर संजय कुमार आगे कहते हैं, “साल 2019 के चुनाव में बंगाल में बीजेपी को दलित वोट 59 फ़ीसद मिला जबकि ममता को 30 फ़ीसद ही मिला। पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में 17 फ़ीसद दलित हैं। इसके अलावा बीजेपी को अपर कास्ट, ओबीसी, और दूसरे सभी समुदाय में तृणमूल के मुक़ाबले थोड़ा वोट ज़्यादा मिला है। ममता के साथ मुसलमान सबसे ज़्यादा जुड़े और उनका एकतरफ़ा वोट तृणमूल को मिला। यही ममता के जीत के पीछे की बड़ी वजह भी बने।”

पश्चिम बंगाल में 30 फ़ीसदी मुसलमान हैं। इसलिए बीजेपी बाक़ी बचे 70 फ़ीसद वोटरों पर दांव लगाए बैठी है। ये उनके जीत के दावे की दूसरी सबसे बड़ी वजह है।

लेकिन संजय कुमार कहते हैं, “बचे हुए 70 फ़ीसद वोटर एकतरफ़ा वोट नहीं करते. इसमें आदिवासी, दलित, ओबीसी सब आते हैं। वोट करने के पीछे उनकी अपनी विचारधारा, दिक्क़तें और वजहें होती हैं। लेकिन बचे हुए 70 फ़ीसद हिंदू आबादी में से अगर बीजेपी 65-70 फ़ीसद को अपनी तरफ़ कर ले, तो बंगाल में उनकी राह आसान हो सकती है।”

इसी अंक गणित पर बीजेपी काम भी कर रही है।

लेकिन प्रोफ़ेसर संजय कुमार को नहीं लगता कि बंगाल का चुनाव राज्य सरकार के कामकाज के आधार पर होने जा रहा है। उनके मुताबिक़ इन बातों से चुनाव कहीं आगे निकल गया है।

वो ये भी नहीं मानते कि बंगाल का चुनाव केवल हिंदुत्व के वोट पर लड़ा जा रहा है। उनके मुताबिक़ ‘जय श्रीराम’ का नारा हो या ‘पोरिबोर्तन यात्रा’ या बंगाल फ़तह ये सब महज़ एक तरीक़ा है, लोगों को एकजुट करना का।

वो अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, “हिदुत्व पर वोट तब होता है जब हिंदू भावना से प्रेरित होकर लोग वोट करें। लेकिन जो लोग ममता को हटाने या उनके विरोध की बात करते हैं, केवल इसलिए नहीं करते कि ममता मुसलमानों का ध्यान रखती हैं। इस आधार पर 100 में से 18-20 फ़ीसद वोटर ही वोट करेंगे। बाक़ी 80 फ़ीसद वोटर राज्य की क़ानून व्यवस्था, गुंडागर्दी, पार्टी में केवल उनके क़रीबीयों को फ़ायदा, मोदी प्रेम जैसे अलग-अलग कारणों से वोट करेंगे।”

इसलिए प्रोफ़ेसर संजय कुमार को लगता है कि ये चुनाव बदलाव के नाम पर लड़ा जा रहा है। जिसमें आधार केवल ‘ममता हटाओ’ या ‘ममता बचाओ’ है।
ये है पश्चिम बंगाल में तीसरी सबसे बड़ी दाव हैं।

लेकिन बंगाल में बीजेपी का मुक़ाबला टीएमसी के कार्डर से है, जो पिछले एक दशक से वहाँ मज़बूती से पैर जमाए बैठा है। उनके पास ममता जैसा प्रशासनिक अनुभव वाला मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी नहीं। टीएमसी के पुराने चेहरों से वहाँ की बीजेपी हाल के दिनों में भर गई है। ऐसे में बीजेपी का गणित कितना काम करेगा, ये देखने वाली बात होगी।

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