Delhi

मुश्किल घड़ी में किए ठोस उपायों की बदौलत पूरी दुनिया में बढ़ा भारत का मान, हर किसी की रही भागीदारी

इतिहास गवाह रहा है कि मानव सभ्‍यता बड़ी मुश्किलों भरे दौर से निकलकर यहां तक पहुंची है। वर्तमान संकट और इससे जीतने की मंशा भी यही बयां करती है। भारत ने कोविड-19 से लड़ने के लिए जो तरीके अपनाए उनकी दुनिया भी तारीख करती है।

मानव सभ्यता का पूरा विकासक्रम देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सभ्यता की विकास-यात्रा सीधीसपाट नहीं रही। अनेक झंझावातों से मुठभेड़ करती हुई वह आज के मुकाम तक पहुंची है। अनेक संकटों ने मानव के पुरुषार्थ को चुनौती दी। उन सबके बीच साहस, धैर्य और विवेक के साथ मानव जाति ने संघर्ष किया। विजयी हुई। सुख-दुख के संतुलन को साधकर मानव सभ्यता ने सृष्टि के विस्तार में अपना योगदान दिया है। ‘व्यक्ति’ का विस्तार ही ‘समाज’ का निर्माण करता है। तमाम भटकावों के बावजूद आदर्श के रूप में, लक्ष्य के रूप में मानव समाज, मानवीय दृष्टि आज भी कायम है। इस दृष्टि को सार्वभौमिक स्वीकृति प्राप्त है।

किसी भी राष्ट्र की, समाज की अग्नि परीक्षा ऐसी संकट की घड़ियों में ही होती है। स्वीकार करना चाहिये कि भारत के सामान्य नागरिकों ने, समाज के विभिन्न अंगों ने धैर्य, साहस और विवेक का परिचय दिया है। इस महामारी की गंभीरता के प्रति आमजन को जागरूक करने का महत्वपूर्ण कार्य जिस मीडिया ने किया, उससे मीडिया की विश्वसनीयता पुन: प्रतिष्ठित होती दिखाई दी। किसी भी राष्ट्र की आंतरिक शक्ति ऐसे ही क्षणों में अभिव्यक्त होती है। इन सबको देखकर लगता है कि भारत अपने राष्ट्र-बोध को निरन्तर सिद्ध करता जा रहा है।

आज दुनिया की नजरों में भारत का जो सम्मान बढ़ा है, वह मानवीय दृष्टि के इन विकसित प्रमाणों से ही पुष्ट हुआ है। इस कार्य में केंद्र सरकार ने जो भूमिका निभाई उसकी प्रशंसा भी करनी होगी। किसी भी क्षण ऐसा नहीं लगा कि महामारी के सामने सरकार ने लाचारी दिखाई हो। हर क्षण आत्मविश्वास के साथ इस विपदा के खिलाफ नित्य नए उपाय खोजने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। इससे देशवासियों का मनोबल भी कायम रहा और सरकार को सहयोग भी दिया। इसी का परिणाम है कि दृश्य बदलता दिखाई दे रहा है। कोरोना के भय से समाज मुक्त हुआ है।

कोरोना ने एक बार फिर भारत के परंपरागत रीति-रिवाज, आचरण, भोजन, जीवन-शैली की सार्थकता सिद्ध कर दिखाई है। पराधीनता काल में सभ्यतागत विमर्श में भारत की इन समृद्ध परंपराओं को पुरातन, पिछड़ी, दकियानूसी आदि शब्दावलियों से लांछित करने की कोशिशें होती रहीं। उनको कोरोना काल ने एक झटके में खारिज कर दिया। आयुर्वेंद पर तो विश्वास बढ़ा ही, तुलसी, अदरक, काली मिर्च, गिलोय के काढ़े ने जनता को इस महामारी की भयंकरता से बचाया।

कालचक्र की गति विचित्र होती है। हम नहीं जानते कि वह कब वक्र हो जाएगी। आज का सच यह है कि देश के सामूहिक प्रयासों से महामारी पर नियंत्रण संभव हो गया है। संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में कमी आना, उपचार से ठीक होने वालों की संख्या बढ़ जाना और मृत्यु दर का बहुत कम हो जाना बताते हैं कि कोरोना के विरुद्ध युद्ध में हम विजय की ओर बढ़ रहे हैं। यह तस्वीर हमारे राष्ट्रीय संकल्प की मजबूती और महत्व को स्थापित करने वाली है। लेकिन यह संतोष हमें महामारी के प्रति लापरवाह न बना दे, यह ध्यान रखना भी आवश्यक है। इसलिए जब तक कोविड-19 का संपूर्ण विनाश नहीं होता, तब तक हमें हर कदम पर सावधानी बरतनी ही होगी। कोरोना के विरुद्ध युद्ध निर्णायक स्थिति में पहुंच गया है। यह समय है जब कोरोना के विरुद्ध सभी दिशाओं से प्रहार हो। जनता इस रक्तबीज से अन्य राक्षसों को पैदा होने से रोके।

सरकारें अपना काम कर रही हैं, जनता अपना दायित्व निभाए। विश्वास, विवेक और समझदारी उन छोटी-छोटी सावधानियों को बरतने में है, जिनसे कोरोना को फैलने से रोका जा सके। सभी सचेत कर रहे हैं मुंह पर मास्क हो, परस्पर शारीरिक दूरी हो, भीड़भाड़ से बचें। थोड़ा सा संयम और अनुशासन देश को उस दुस्वप्न से मुक्त कर देगा जो पिछले सात-आठ माह से हमें घेरे हुए है। उससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब हम इस युद्ध में अनुशासित सैनिक बन कर सक्रिय होंगे। विपदा की घड़ी में आत्म अनुशासन ज्यादा मजबूत होना चाहिए। सतर्कता, समर्पण के साथ ही हम विजयी होंगे।

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