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10 अर्थशास्त्रियों का कृषि मंत्री को खत- वापस लीजिए तीनों कानून

10 अर्थशास्त्रीयों ने लिखा खत

विभिन्न संस्थानों के 10 वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को एक चिट्ठी लिखकर तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की है. अर्थशास्त्रियों ने दावा किया है कि तीनों कानून ‘मूल रूप से नुकसानदायक’ हैं.

द प्रिंट ने इस चिट्ठी को एक्सेस किया है. इसके मुताबिक, अर्थशास्त्रियों ने कहा कि ये कानून छोटे और सीमांत किसान के हित में नहीं हैं. इसमें कहा गया, “हमें लगता है कि भारत सरकार को तीनों कानूनों को वापस लेना चाहिए, जो कि देश के छोटे और सीमांत किसान के हित में नहीं हैं और जिनके खिलाफ किसान संगठनों के बड़े धड़े ने आपत्ति जताई है.”

अर्थशास्त्रियों की 5 चिंताएं

कानूनों को वापस लेने की मांग के पीछे अर्थशास्त्रियों ने पांच चिंताएं बताई हैं. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक ये चिंताएं हैं:

एग्रीकल्चरल मार्केट को रेगुलेट करने के लिए राज्य सरकारों की भूमिका को कम किया गया है क्योंकि स्थानीय हकीकतों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकारों की मशीनरी किसानों की ज्यादा पहुंच में होती है और जवाबदेही भी होती है.

कानून से ट्रेड में दो बाजार बन जाएंगे- एक रेगुलेटेड APMC और दूसरा अनरेगुलेटेड और दोनों के अलग नियम और फीस होगी. प्राइस और नॉन-प्राइस मुद्दों को लेकर किसानों का उत्पीड़न बढ़ जाएगा. मिलीभगत और बाजार को प्रभावित करने का खतरा रेगुलेटेड APMC बाजार और अनरेगुलेटेड बाजार दोनों में बढ़ जाएगा और अनरेगुलेटेड वाले में इसके समाधान की भी कोई प्रक्रिया नहीं होगी.

बिहार की एक केस स्टडी का हवाला देते हुए अर्थशास्त्रियों ने कहा कि 2006 में APMC कानून हटने के बाद किसानों के लिए मोलभाव करने और विकल्पों में कमी आई है और इससे दूसरे राज्यों के मुकाबले कम दाम पर फसल बिक रही है.

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में असमान खिलाड़ियों की मौजूदगी किसानों के हित का बचाव नहीं करेगी.

अर्थशास्त्रियों ने बड़े कृषि-व्यापारों के प्रभुत्व पर चिंता जताते हुए कहा कि छोटे किसान बाजार से बाहर हो जाएंगे.

अर्थशास्त्रियों के सुझाव

अर्थशास्त्रियों ने सुझाव दिया कि किसानों को बेहतर व्यवस्था चाहिए जिसमें उनके पास मोलभाव की ज्यादा गुंजाइश हो. सरकार से कानूनों को वापस लेने की अपील करते हुए अर्थशास्त्रियों ने कहा कि ‘सच में लोकतांत्रिक काम’ कीजिए और किसान संगठनों की चिंताओं को सुनिए.

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